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क्या आप उसके सहायक बनेंगे ?

देवा पाना दे ,देवा पेचकस देना ,आइल साफ़ कर देवा, ,देवा, देवा..........  नहीं ये सन्नी दयोल की किसी फिल्म का डायलॉग नहीं है बल्कि एक गरीव परिवार के एकमात्र सहारे की घटित कहानी है। दुनिया में दो तरह की सरकारें हैं एक सरकार लोगों पर शासन करती है दूसरी लोगों के दिलों पर। जनता पर राज करने वाली सरकार खुद डरी हुई होती है और जनता को भी डराया ही करती है। लेकिन दिलों पर राज करने वाली इलाही सरकार खुद भी निर्भय और जनता को भी निर्भय बनाती है। जनता पर शासन करने वाले पहले चढ़ा देते हैं फिर कहते हैं कूद जा संभाल लेंगे और खुद हट जाती है परिणाम, धड़ाम की आवाज से गिरा देते हैं। यही खेल चलता रहा है ,परन्तु ऊपर वाली सरकार(इलाही /भगवान् ) का सहारा जिसने भी लिया उसे सभी सेवा और सहारा देने की कोशिश करते हैं। जिसका प्रतीक दिवस गुरु पूनम के रूप में मनाया जाता है।
अब आते हैं देवा कि कहानी पर ,बूढी मां तथा पोलियो ग्रस्त भाई की ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर लेने के लिए 10 वीं कक्षा पास करके ज़िन्दगी के मैदान में उतरा ही था कि जीवन ने एक और करवट ली देवा मानसिक रूप से बीमार हो गया। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मोपका के राजकिशोर नगर में गंदे -अस्त्-ब्यस्त कपड़ों में घूमता रहता और लोगों को तंग भी करता। उस क्षेत्र में आशा  ऑटोकेयर के मालिक विजय कुमार भी काम करते थे ,वही एक इंसान थे जिनकी बात देवा सुनता था। विजय के गैराज में आठ लड़के काम करते थे सभी देवा से प्रेमभरा व्यवहार करते थे। वे पैसे दे कर देवा की सहायता करते थे लेकिन सब व्यर्थ ही था ,पैसे के लालच में भी देवा कोई काम नहीं करता था।काफी समय ये सिलसिला चला फिर   एक दिन विजय तथा उनके स्टाफ ने देवा को सरकारी मेन्टल हॉस्पिटल ,शेंदरी (बिलासपुर ) ले जा कर इलाज करवाने की ठानी। सरकारी अस्पताल में बिना ज़िम्मेदार सम्बन्धी की उपस्थिति में इलाज होना कठिन था फिर  देवा की माँ की गवाही पर इलाज शुरू हुआ। देवा भाग जाता तो दोस्त पकड़ कर बापिस अस्पताल ले आते। जितने भी शुभ चिंतक थे देवा के सभी भरपूर वक़्त दिया देवा के इलाज के समय हाँ ,पैसा वे लोग नहीं दे पाए क्योंकि उनकी अपनी आमदनी भी गुजारे लायक ही थी शायद। खैर ,5 -6 महीने के इलाज से देवा ठीक हुआ और परिवार की ज़िम्मेदारी लेना चाहता था पर देवा को उसके क्षेत्र में कोई काम पर नहीं रख रहा था ,एक बार फिर ऑटो केयर वाले विजय और उनकी टीम ने देवा का हाथ थाम लिया और अपने साथ हेल्पर रख लिया।2-3 महीने में देवा एक अच्छा हेल्पर बन गया और अपनी कमाई से परिवार की सेवा ज़िम्मेदारी से निभा रहा है। परिवार के साथ ही गाडी मैकेनकों की टीम भी खूब सुकून महसूस करती है जब देवा परिवार के साथ खुशियां मनाता है।
यहीं पर उस उप्परवाली सरकार की दया और किरपा साक्षात् दिखती है। उधर कोई और देवा जैसा माँ का इकलौता सहारा कहीं इलाज के लिए 'विजय मकैनिक ' का इंतज़ार कर रहा है
क्या आप उसके सहायक बनेंगे ?



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