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Hindu Teachings/निश्चित ही सेकुलरिज्म खतरे में पड जाएगा........

चुन अपने लिए फूल या खार तू ,कि नेकी -बदी का है  मुख़तार तू ,जो दिल चाहे इस ज़िंदगी को सँबार ,बहार इसकी देख और उजाला निखार , जो दिल चाहे यह बाग बीरान  कर ,खुद अपनी तबाही के सामान कर,जो दिल चाहे ले राह -ए अक्लो स्वाब ,जो दिल  चाहे कर अपनी मिट्टी ख़राब।  हिन्दू धर्म पे कुठार घात सदियों से होते रहे  हैं , लेकिन  कभी भी सख्त शब्दों का या ऐसा कहें कोई भी कठोर विरोध नहीं किया गया , क्यों ?? क्योंकि हिन्दू धर्म में दुसरे धर्म के  विरोध में  कभी कुछ कहा  ही नहीं गया।  स्वामी गीतानन्द जी ने ख्वाज़ा दिल मुहम्मद साहिब के शब्दों का तर्जुमा हिंदी में किया क्योंकि इन शब्दों में मनुष्य मात्र के लिए सन्देश है।   कोई भी हिन्दू संत इस्लाम या क्रिश्चियन धर्म के ग्रंथों में से नकारात्मक सन्देश कभी हिंदी में अनुबादित  ही नहीं करता  , कारण सिर्फ यही था "दूसरों की निंदा का अर्थ है उन अबगुणो को अपने जीवन में समाहित करना"।  खैर हम क्यों नकारात्मकता को अपनाएँ , चलो एक दिया जलाएं। जिंदगी रूप में हमे एक बगीचा मिला है...

क्या विदेशों में लोग पांच गुणों से पार पा गए हैं ?

पिछले कई दिनों से एक विचार पर मंथन चल रहा था , आज विचारों को शव्दों में पिरोने का मन किया है। आजकल हमारे आसपास विदेश जा कर बसने  की इच्छा रखने वालों की तादाद काफी बढ़ गयी है।  युवाओं में एक होड़ सी लगी हुई है विदेश प्रेम की।  बात करने पे पता चला के अधिकतर लोगों का मानना है के विदेशों में सुख-सुबिधायें बहुत हैं , सुरक्षा बहुत होती है , बच्चों का ख्याल विदेशों में सरकारें रखती हैं ,वहां पर्यावरण बहुत अच्छा है , वहां के लोग -समाज बहुत अच्छे होते हैं।  चिंता मुक्त जीवन होता है आदि आदि।  हमारे एक मित्र  अमेरिका में गुरुद्वारे में पाठ करते हैं वो भी अमेरिका और वहां के लोगों के बारे में खूब तारीफ़ करते है। एक मित्र कैनेडा रहता है और वहां की बहुत तारीफ करता है।  ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में भी जो जानकार रहते हैं उनका भी वहां के  बारे में सकारात्मक सोचना है। खैर , मेरा  उनकी तारीफ़ से विरोध नहीं है बल्कि मुझे ख़ुशी है जिसे सुख और चैन  से  जीवन जीने का सपना जीते जी पूरा हो गया वर्ना यहाँ तो मौत के बाद  स्वर्ग की कल्पना है। ल...