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क्या विदेशों में लोग पांच गुणों से पार पा गए हैं ?

पिछले कई दिनों से एक विचार पर मंथन चल रहा था , आज विचारों को शव्दों में पिरोने का मन किया है।
आजकल हमारे आसपास विदेश जा कर बसने  की इच्छा रखने वालों की तादाद काफी बढ़ गयी है।  युवाओं में एक होड़ सी लगी हुई है विदेश प्रेम की।  बात करने पे पता चला के अधिकतर लोगों का मानना है के विदेशों में सुख-सुबिधायें बहुत हैं , सुरक्षा बहुत होती है , बच्चों का ख्याल विदेशों में सरकारें रखती हैं ,वहां पर्यावरण बहुत अच्छा है , वहां के लोग -समाज बहुत अच्छे होते हैं।  चिंता मुक्त जीवन होता है आदि आदि।  हमारे एक मित्र  अमेरिका में गुरुद्वारे में पाठ करते हैं वो भी अमेरिका और वहां के लोगों के बारे में खूब तारीफ़ करते है। एक मित्र कैनेडा रहता है और वहां की बहुत तारीफ करता है।  ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में भी जो जानकार रहते हैं उनका भी वहां के  बारे में सकारात्मक सोचना है। खैर , मेरा  उनकी तारीफ़ से विरोध नहीं है बल्कि मुझे ख़ुशी है जिसे सुख और चैन  से  जीवन जीने का सपना जीते जी पूरा हो गया वर्ना यहाँ तो मौत के बाद  स्वर्ग की कल्पना है।
लेकिन जो बात मुझे असहज करती है वह है "क्या विदेशों में लोग पांच गुणों से पार पा गए हैं ?
ये गुण  हैं :-
1 काम (इच्छा )
2 क्रोध
3 लोभ
4 मोह
5 अहंकार
अब मुझे समझने में तो देर नहीं लगी की इस सब के पीछे की  कहानी क्या है , मित्रो जब भी कोई विदेशों की तारीफ़ करता है तो ये प्रशन सहज ही उठता है।  और मज़ेदार बात ये है के ये पाँचों गुण जब सर्वव्यापी हैं  तो दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई भी रहे सिर्फ इंसानो की बात नहीं जीव -जन्तु -पशु -पक्षी सभी इनके प्रभाव के घेरे में ही जीवन जी रहे हैं।  लेकिन अचंभित होता हूँ के  चमड़ी के प्रभाव के कारन ये वैशबिक गुण अंग्रेजों पे असर नहीं करते होंगे।   

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