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Swami Gita Nand ji's Art of Livingअगर कल से बेहतर नहीं आज तुम , तो इक दिन की दौलत हुई तुमसे गुम।

बना ज़र्रे -ज़र्रे से कोह -ए -गिराँ , हुए कतरे -कतरे से दरिया रवां। अगर थोड़ा -थोड़ा किये जाओगे , मुरादों के सुमरे लिये जाओगे। जो सेहत नहीं तन में चुस्ती कहाँ , टको से मिले तन्दरूस्ती कहाँ। तुझे तन्दरूस्ती की लाजम है कदर , कि मुलक -ए -बदन में न हो जाये ग़दर।  मर्ज़ से खिरदमन्द को आर है ,मरीज आप अपना गुनाहगार है। है सेहत से रूहानियत का मजा ,हो पोशाक उजली तो खुशबू लगा। वो पेटू जो खा-खा के बीमार हो , कहो उससे फाके को तैयार हो , वो दावत उडाने की लज्ज़त ही क्या , की इक दिन ग़िज़ा और दस दिन दवा। नजरहो तो जौहर को जौहर कहे , है अन्धा जो हीरे को ककर कहे। है जाहिल को नेकी -बदी बात एक , कि होते है अन्धे को दिन -रात एक। भला मर्द जाहिल का ईमान क्या! की अन्धो को रंगो की पहचान क्या!! गधे को उढ़ा दे जो मखमल की झूल , दुलत्ती चालान न जायेगा भूल। बहुत लोग बातो में लुकमान है , अमल में जो देखो तो नादान है। जो सीखो किसी को सीखते चलो ,दिये से दिये को जलाते चलो। गवाये गा आकल न बेकार दिन , की इन्सा की है जिन्दगी चार दिन। नहीं वक़्त से बढ़ के अनमोल माल , न माजी को रो अब तबाह कर न हाल। ओ हर...

Swami GitaNand ji Mahraj (VEER JI) ki ---- जीने की कला

 इरादा है   मर्दो का कोह-ए-गिरां ,पहाड़ अपनी जा से टलेगा कहाँ , जो तू है बहादुर समझ ले यही ,कि है 'तख़्त या तख़्ता 'मंज़िल मेरी। इरादा तेरा है जो सुलझा हुआ ,रहेगा न तू गम से उलझा हुआ। अगर बाज के पर हो आरास्ता  ,हवा में हर इक सिम्मत है रास्ता।   तू लफ्जों को कामों के  साँचे में ढाल ,नसीयत से बेहतर है अच्छी मिसाल। जो मन्जिल को जाना है सामान बाँध ,हवा के न दामन में अरमान बाँध। कोई है मुअज्ञ्ज्ज  ,कोई ख़्वार है , हर इक अपनी किस्मत का मेमार है। कलम खूब हो  रोशनाई हो खूब ,जो दिल खूब हो तो लिखाई हो खूब।  जमाना  गिरे को उठता नहीं,गिरा अश्क फिर हाथ आता नहीं , जो दिल अपना दुबिधा में पाता है तू ,तो उड़ता नहीं फ़ड़फ़ड़ाता है तू। तबीयत हो यकसू तो होता है काम ,कि दुबिधा में माया मिलेगी न राम। अगर कामयाबी न हो जी न छोड,गिरे भी जो सौ बार हिम्मत न तोड़। वो जीतेगा हो जिसका दिल उस्तवार ,वो हारेगा दिल जिसका जायेगा हार। न मौजों थपेड़ों को ला ध्यान में ,हो मीनार तूफान पुरनूर में। मुसीबत उठा और मुँह से न बोल ,कि एहरन है  मजबूत ओछा है ढोल। ...

1857 First War for Independence /काटजू -शोभा डे - फोटो खिंचवाने के लिए "गौ " क्या "गूँ " भी खा सकते हैं

भारत वही देश है  जहाँ गौ- चर्बी बाले कारतूस को लेकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिद्रोह का बिगुल बजा था.… और मंगल -मंगल -मंगल -मंगल हो.गयी थी  ………।   बड़ी वचित्र स्थिति है हमारे देश की एक तरफ देश तरक्की की राह खोज रहा है , दूसरी तरफ जाती - धर्म -मजहब की राजनीति उफान पर है।  बीजेपी द्वारा साफ-साफ़ दो टूक गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध काफी कुछ व्यान करता है।  अगर आपने इतिहास पढ़ा हो तो 1857 की आज़ादी की पहली क्रांति का सबसे बड़ा कारण भी 'गौ-हत्या " ही रही।  जैसा के मैंने पहले भी लिखा था भारत के लोग या हिन्दू महाभारत के युद्ध से हुए विनाश के कारण लड़ाई -झगडे और हथियारों से दूर ही रहते थे , लेकिन जैसे ही "गौ -माता " पे बात आई अंग्रेज़ों की सत्ता के आखरी दिन शुरू हो गए।  मंगल पांडे ने सुप्त समाज को जाग्रत कर दिया सिर्फ यही नहीं सूअर की चर्बी बाले कारतूस मुसलमानो को अंग्रेज़ो के खिलाफ होने के लिए काफी थे।  हिन्दू और मुस्लिम दोनों एक साथ ब्रिटिश राज के खिलाफ खड़े हो  गए थे क्योंकि 'गौ-माता और सूअर' को मार कर उनकी चर्वी से कारतूस बना दिए यहां तक तो सब ठीक...

Hindu Teachings/निश्चित ही सेकुलरिज्म खतरे में पड जाएगा........

चुन अपने लिए फूल या खार तू ,कि नेकी -बदी का है  मुख़तार तू ,जो दिल चाहे इस ज़िंदगी को सँबार ,बहार इसकी देख और उजाला निखार , जो दिल चाहे यह बाग बीरान  कर ,खुद अपनी तबाही के सामान कर,जो दिल चाहे ले राह -ए अक्लो स्वाब ,जो दिल  चाहे कर अपनी मिट्टी ख़राब।  हिन्दू धर्म पे कुठार घात सदियों से होते रहे  हैं , लेकिन  कभी भी सख्त शब्दों का या ऐसा कहें कोई भी कठोर विरोध नहीं किया गया , क्यों ?? क्योंकि हिन्दू धर्म में दुसरे धर्म के  विरोध में  कभी कुछ कहा  ही नहीं गया।  स्वामी गीतानन्द जी ने ख्वाज़ा दिल मुहम्मद साहिब के शब्दों का तर्जुमा हिंदी में किया क्योंकि इन शब्दों में मनुष्य मात्र के लिए सन्देश है।   कोई भी हिन्दू संत इस्लाम या क्रिश्चियन धर्म के ग्रंथों में से नकारात्मक सन्देश कभी हिंदी में अनुबादित  ही नहीं करता  , कारण सिर्फ यही था "दूसरों की निंदा का अर्थ है उन अबगुणो को अपने जीवन में समाहित करना"।  खैर हम क्यों नकारात्मकता को अपनाएँ , चलो एक दिया जलाएं। जिंदगी रूप में हमे एक बगीचा मिला है...

Hindu /हिन्दू धर्म की शिक्षा मज़ाक क्यों लगती रही ?

"गनीमत समझ जिंदगी की बहार , के मानुष चोला नहीं बार -बार ,तू कर इस तरह बाग -ए -हस्ती की सैर ,की इंजाम जिस सैर का हो बखैर " ये दोहे ख्वाज़ा दिल मुहम्मद साहेब के द्वारा लिखे गए हैं और हिंदी में अनुबाद स्वामी गीतानन्द जी (वीर जी ) गीतानगरी अम्बाला वालों ने किया है।   स्वामी जी  भगवान कृष्ण तथा गीता के महान  अनुयाई और भक्त थे।लेकिन उन्होंने मुस्लिम विचारकों तथा संतों की बाणी  को भी अपने साधकों  साथ साझा किया और सर्वधर्म समभाव  का सन्देश दिया।     भारत में हिन्दू धर्म सेक्युलर ज़मात के  निशाने पर रहा  है , पिछले दिनों  में टी बी और अखबारों में काफी वक़्त हिन्दू धर्म की निंदा पे खर्च किया गया।  मै हैरान होता हूँ के कॉर्पोरेट ट्रैनिंग्स तथा मोटिवेशनल पाठ पढ़ाने वाले लोग हर जगह एक ही बात दोहराते हैं के 'निंदा ' से बचो।  गोस्वामी तुलसीदास जब रामायण लिख कर हटे तो किसी ने पुछा "गोस्वामी जी आपने रावण की निंदा और उसकी बात बहुत कम करी है ऐसा क्यों ? गोस्वामी जी ने बोला - रावण के अवगुण अगर मै बार-बार स्मरण...

ISIS के खिलाफ फतवे ज़ारी

ये खबर भारत के मीडिया ने दवा दी , देश में कोई भी मुस्लिम जब देश प्रेम और भाई चारे की बात करता है तो उसे सम्पूर्ण उत्साह के साथ पूरा समर्थन और सम्मान मिलना चाहिए।  भारत का दुर्भाग्य है के जनता को खवर पहुंचाने वाले खवर नफीस या तो कम्युनिस्ट माईंड / सोच के हैं या फिर बिकाऊ किसम के पत्रकार हैं ,  दोष इन लोगों का नहीं है , पत्रकारिता में इम्मान्दारी से काम करने वाले को तो गुज़ारे लायक पगार भी नहीं मिलती।  अधिकतर लोग टी वी में चमकती हसीनाओं को खबरें देते देख कर सोच लेते हैं के पत्रकारों की तो बल्ले-बल्ले होती है लेकिन सच बहुत भयाभय और कड़वा है ,खैर इस मुद्दे पे कभी फिर बात करेंगे , तो मुसलमान अगर isis का झंडा उठाते हैं तब तो टी वी पर खूब बहस  और खबर कई दिनों तक दिखाई जाती है ,लेकिन जब मुस्लिम लोग isis के खिलाफ झंडा उठाते हैं तो ये खबर , खबर ही नहीं बनती।  इससे सिर्फ एक ही सन्देश जाता है के भारत का मीडिया खाता भारत का है लेकिन उस ही थाली में छेद भी कर रहा है जिसमे खता है।  दुःख दायक है , परन्तु एक बात तो साफ़ हो गयी है के सोशल मीडिया ने पारम्परिक मीडिया की नाक में ...

Suresh Chiplunkar's FTII के “लाल” कारनामों का श्वेत-पत्र

========================== FTII के “लाल” कारनामों का श्वेत-पत्र ========================== जब से मोदी सरकार ने केन्द्र में सत्ता संभाली है, अक्सर हमें विभिन्न चैनलों और अखबारों में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी “भगवाकरण हो रहा है” जैसा कुछ बडबडाते हुए मिल ही जाते हैं. “संस्थाओं का, शिक्षा का भगवाकरण हो रहा है” यह कथित आरोप कोई नई बात नहीं है, जब वाजपेयी सरकार में मुरलीमनोहर जोशी मानव संसाधन मंत्री थे, तब भी ऐसे कथित बुद्धिजीवी यही बात लगातार दोहराते थे. चूँकि मोदी सरकार इस बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई है, इसलिए वामपंथ नियंत्रित और विदेशों की नाजायज़ स्कॉलरशिप से “पोषित” बुद्धिजीवियों के गिरोह का स्वर इस बार और भी तीखे हैं. पिछले दो-तीन माह से पुणे स्थित फिल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट (FTII) में गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति को लेकर जो बवाल काटा जा रहा है, वह इसी गिरोह की कारस्तानी है. FTII में छात्रों के कंधे पर रखकर जो वामपंथी बन्दूक चल रही है, उसकी जड़ में इस संस्थान पर पिछले कई वर्षों का कब्ज़ा गँवाने का डर तथा इन वर्षों में किए गए तमाम लाल-काले कारनामों के उजागर होने का डर, यह दो प्रमुख का...