बना ज़र्रे -ज़र्रे से कोह -ए -गिराँ ,
हुए कतरे -कतरे से दरिया रवां।
अगर थोड़ा -थोड़ा किये जाओगे ,
मुरादों के सुमरे लिये जाओगे।
जो सेहत नहीं तन में चुस्ती कहाँ ,
टको से मिले तन्दरूस्ती कहाँ।
तुझे तन्दरूस्ती की लाजम है कदर ,
कि मुलक -ए -बदन में न हो जाये ग़दर।
मर्ज़ से खिरदमन्द को आर है ,मरीज आप अपना गुनाहगार है।
है सेहत से रूहानियत का मजा ,हो पोशाक उजली तो खुशबू लगा।
वो पेटू जो खा-खा के बीमार हो ,
कहो उससे फाके को तैयार हो ,
वो दावत उडाने की लज्ज़त ही क्या ,
की इक दिन ग़िज़ा और दस दिन दवा।
नजरहो तो जौहर को जौहर कहे ,
है अन्धा जो हीरे को ककर कहे।
है जाहिल को नेकी -बदी बात एक ,
कि होते है अन्धे को दिन -रात एक।
भला मर्द जाहिल का ईमान क्या!
की अन्धो को रंगो की पहचान क्या!!
गधे को उढ़ा दे जो मखमल की झूल ,
दुलत्ती चालान न जायेगा भूल।
बहुत लोग बातो में लुकमान है ,
अमल में जो देखो तो नादान है।
जो सीखो किसी को सीखते चलो ,दिये से दिये को जलाते चलो।
गवाये गा आकल न बेकार दिन ,
की इन्सा की है जिन्दगी चार दिन।
नहीं वक़्त से बढ़ के अनमोल माल ,
न माजी को रो अब तबाह कर न हाल।
ओ हर काम करता रहे वक़्त पर ,
मिले उसको आराम शाम -ओ -सहर।
न कर उमर की इक भी जाया घड़ी ,
कि टूटी लड़ी जब की छूटी कड़ी।
बही कामरा हो जहाँ में मदाम ,
मुकद्दम जिसे काम पीछे तआम।
अगर कल से बेहतर नहीं आज तुम ,
तो इक दिन की दौलत हुई तुमसे गुम।
हुए कतरे -कतरे से दरिया रवां।
अगर थोड़ा -थोड़ा किये जाओगे ,
मुरादों के सुमरे लिये जाओगे।
जो सेहत नहीं तन में चुस्ती कहाँ ,
टको से मिले तन्दरूस्ती कहाँ।
तुझे तन्दरूस्ती की लाजम है कदर ,
कि मुलक -ए -बदन में न हो जाये ग़दर।
मर्ज़ से खिरदमन्द को आर है ,मरीज आप अपना गुनाहगार है।
है सेहत से रूहानियत का मजा ,हो पोशाक उजली तो खुशबू लगा।
वो पेटू जो खा-खा के बीमार हो ,
कहो उससे फाके को तैयार हो ,
वो दावत उडाने की लज्ज़त ही क्या ,
की इक दिन ग़िज़ा और दस दिन दवा।
नजरहो तो जौहर को जौहर कहे ,
है अन्धा जो हीरे को ककर कहे।
है जाहिल को नेकी -बदी बात एक ,
कि होते है अन्धे को दिन -रात एक।
भला मर्द जाहिल का ईमान क्या!
की अन्धो को रंगो की पहचान क्या!!
गधे को उढ़ा दे जो मखमल की झूल ,
दुलत्ती चालान न जायेगा भूल।
बहुत लोग बातो में लुकमान है ,
अमल में जो देखो तो नादान है।
जो सीखो किसी को सीखते चलो ,दिये से दिये को जलाते चलो।
गवाये गा आकल न बेकार दिन ,
की इन्सा की है जिन्दगी चार दिन।
नहीं वक़्त से बढ़ के अनमोल माल ,
न माजी को रो अब तबाह कर न हाल।
ओ हर काम करता रहे वक़्त पर ,
मिले उसको आराम शाम -ओ -सहर।
न कर उमर की इक भी जाया घड़ी ,
कि टूटी लड़ी जब की छूटी कड़ी।
बही कामरा हो जहाँ में मदाम ,
मुकद्दम जिसे काम पीछे तआम।
अगर कल से बेहतर नहीं आज तुम ,
तो इक दिन की दौलत हुई तुमसे गुम।
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