1857 First War for Independence /काटजू -शोभा डे - फोटो खिंचवाने के लिए "गौ " क्या "गूँ " भी खा सकते हैं
भारत वही देश है जहाँ गौ- चर्बी बाले कारतूस को लेकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिद्रोह का बिगुल बजा था.… और मंगल -मंगल -मंगल -मंगल हो.गयी थी ………।
बड़ी वचित्र स्थिति है हमारे देश की एक तरफ देश तरक्की की राह खोज रहा है , दूसरी तरफ जाती - धर्म -मजहब की राजनीति उफान पर है। बीजेपी द्वारा साफ-साफ़ दो टूक गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध काफी कुछ व्यान करता है। अगर आपने इतिहास पढ़ा हो तो 1857 की आज़ादी की पहली क्रांति का सबसे बड़ा कारण भी 'गौ-हत्या " ही रही। जैसा के मैंने पहले भी लिखा था भारत के लोग या हिन्दू महाभारत के युद्ध से हुए विनाश के कारण लड़ाई -झगडे और हथियारों से दूर ही रहते थे , लेकिन जैसे ही "गौ -माता " पे बात आई अंग्रेज़ों की सत्ता के आखरी दिन शुरू हो गए। मंगल पांडे ने सुप्त समाज को जाग्रत कर दिया सिर्फ यही नहीं सूअर की चर्बी बाले कारतूस मुसलमानो को अंग्रेज़ो के खिलाफ होने के लिए काफी थे। हिन्दू और मुस्लिम दोनों एक साथ ब्रिटिश राज के खिलाफ खड़े हो गए थे क्योंकि 'गौ-माता और सूअर' को मार कर उनकी चर्वी से कारतूस बना दिए यहां तक तो सब ठीक था , मुसीबत तब हुई जब वे कारतूस सैनिकों में बांटे गए और हिन्दू सैनिको को बताया गया के गौ-चर्वी से बने कारतूस मुहं से छीलकर चलाने पड़ेंगे ऐसी ही बात मुस्लिम सैनिको को बोली गयी और फिर जो हुआ इतिहास गवाह है।
खैर , आज़ादी के बाद नेहरू ने गौ रक्षा से जुड़ा कानून कभी आने ही नहीं दिया और अधिकतर कांग्रेसी नेता जो जन्म से चाहे हिन्दू थे लेकिन तलवे चाट-चाट कर आधे अँगरेज़ तो हो ही गए थे उनको गौ -हत्या बुरी नहीं लगती थी। समाज में ऐसी हवा बन गयी के हिन्दू लोग मंदिर में गौ-माता की जय तो करते हैं लेकिन गौ-हत्या के खिलाफ कभी बोलता ही नहीं था और अगर कोई बोलता था उसकी आवाज़ सीमित रह जाती थी लेकिन सोशल मीडिया ने ये गैप खत्म कर दिया और नतीजा "दादरी" में है।
अच्छा एक और ताजुब की बात है "यादव " लोग खुद को यदु वंशी / भगवान कृष्ण के परिवार से बताते हैं , लेकिन सच तो ये है के भगवान कृष्ण के परिवार या वंश के सदस्य उनके काल में ही समाप्त हो गए थे , चलो मान भी लो के यादव कृष्ण वंशी हैं लेकिन उनके कर्म उनको राक्षस बना रहे हैं , उदाहरण ये देखिये दादरी काण्ड है और तो और इस काण्ड की सच्ची कहानी कुछ और ही है बीजेपी नेता संगीत सोम का व्यान तो यही बता रहा है :--
खैर बात दादरी की ही नहीं है कई ऐसे काण्ड हुए हैं जिनमे हिन्दू -गौ-रक्षक गए मीडिया में न्यूज़ चली एक लिंक हूँ , दूसरी तस्वीर शेयर कर रहा हूँ
http://satyavijayi.com/15-yr-old-boy-killed-on-minor-cattle-issue-by-muslims-in-firing-on-temple-in-up-where-is-media/
सहारनपुर में एक पुलिस वाले को गौ-तस्कर कुचल कर चले गए लेकिन सेकुलरिज़्म बिना किसी डर के खड़ा रहा जैसे ही मुस्लिम मरा सेकुलरिज़्म डगमगा गया ,मीडिया सकपका गयी। सच कड़वा है लेकिन कहना पडेगा मीडिया में काम करने वाले अधिकतर हिन्दू ही हैं और आगे आप भी जानते हैं।
खैर काटजू साहेब की पिटाई के समाचार ने काफी आनंद दिया। काटजू ,शोभा डे आदि लोग केजरीवाल टाईप हैं फोटो खिंचवाने के लिए "गौ "क्या ये लोग "गूँ " भी खा सकते हैं और साधारण लोग इनका मुकाबला नहीं कर सकते हाँ , मीडिया रुपी मक्खी को ये लोग पसंद आते रहेंगे।
बड़ी वचित्र स्थिति है हमारे देश की एक तरफ देश तरक्की की राह खोज रहा है , दूसरी तरफ जाती - धर्म -मजहब की राजनीति उफान पर है। बीजेपी द्वारा साफ-साफ़ दो टूक गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध काफी कुछ व्यान करता है। अगर आपने इतिहास पढ़ा हो तो 1857 की आज़ादी की पहली क्रांति का सबसे बड़ा कारण भी 'गौ-हत्या " ही रही। जैसा के मैंने पहले भी लिखा था भारत के लोग या हिन्दू महाभारत के युद्ध से हुए विनाश के कारण लड़ाई -झगडे और हथियारों से दूर ही रहते थे , लेकिन जैसे ही "गौ -माता " पे बात आई अंग्रेज़ों की सत्ता के आखरी दिन शुरू हो गए। मंगल पांडे ने सुप्त समाज को जाग्रत कर दिया सिर्फ यही नहीं सूअर की चर्बी बाले कारतूस मुसलमानो को अंग्रेज़ो के खिलाफ होने के लिए काफी थे। हिन्दू और मुस्लिम दोनों एक साथ ब्रिटिश राज के खिलाफ खड़े हो गए थे क्योंकि 'गौ-माता और सूअर' को मार कर उनकी चर्वी से कारतूस बना दिए यहां तक तो सब ठीक था , मुसीबत तब हुई जब वे कारतूस सैनिकों में बांटे गए और हिन्दू सैनिको को बताया गया के गौ-चर्वी से बने कारतूस मुहं से छीलकर चलाने पड़ेंगे ऐसी ही बात मुस्लिम सैनिको को बोली गयी और फिर जो हुआ इतिहास गवाह है।
खैर , आज़ादी के बाद नेहरू ने गौ रक्षा से जुड़ा कानून कभी आने ही नहीं दिया और अधिकतर कांग्रेसी नेता जो जन्म से चाहे हिन्दू थे लेकिन तलवे चाट-चाट कर आधे अँगरेज़ तो हो ही गए थे उनको गौ -हत्या बुरी नहीं लगती थी। समाज में ऐसी हवा बन गयी के हिन्दू लोग मंदिर में गौ-माता की जय तो करते हैं लेकिन गौ-हत्या के खिलाफ कभी बोलता ही नहीं था और अगर कोई बोलता था उसकी आवाज़ सीमित रह जाती थी लेकिन सोशल मीडिया ने ये गैप खत्म कर दिया और नतीजा "दादरी" में है।
अच्छा एक और ताजुब की बात है "यादव " लोग खुद को यदु वंशी / भगवान कृष्ण के परिवार से बताते हैं , लेकिन सच तो ये है के भगवान कृष्ण के परिवार या वंश के सदस्य उनके काल में ही समाप्त हो गए थे , चलो मान भी लो के यादव कृष्ण वंशी हैं लेकिन उनके कर्म उनको राक्षस बना रहे हैं , उदाहरण ये देखिये दादरी काण्ड है और तो और इस काण्ड की सच्ची कहानी कुछ और ही है बीजेपी नेता संगीत सोम का व्यान तो यही बता रहा है :--
दादरी हिंसा में राहुल यादव की क्या भूमिका है? उसे गोली किस बात पे लगी?दादरी की घटना आधी अधूरी बताई जा रही है , जो जानवर मारा गया वह "बछिया" थी , 4 माह की , उसे अकलाख ने राहुल यादव के घर से चुराया था , राहुल यादव के विरोध करने पर इखलाख के लड़के दानिश ने उसको गोली मारी थी , बाद मे जो हुआ वो केवल प्रतिक्रिया और प्रतिशोध थी । राहुल यादव अभी भी अस्पताल मे हैं और जीवन से संघर्ष कर रहा हैं. (संगीत सोम के बयान पर आधारित)
खैर बात दादरी की ही नहीं है कई ऐसे काण्ड हुए हैं जिनमे हिन्दू -गौ-रक्षक गए मीडिया में न्यूज़ चली एक लिंक हूँ , दूसरी तस्वीर शेयर कर रहा हूँ
http://satyavijayi.com/15-yr-old-boy-killed-on-minor-cattle-issue-by-muslims-in-firing-on-temple-in-up-where-is-media/
सहारनपुर में एक पुलिस वाले को गौ-तस्कर कुचल कर चले गए लेकिन सेकुलरिज़्म बिना किसी डर के खड़ा रहा जैसे ही मुस्लिम मरा सेकुलरिज़्म डगमगा गया ,मीडिया सकपका गयी। सच कड़वा है लेकिन कहना पडेगा मीडिया में काम करने वाले अधिकतर हिन्दू ही हैं और आगे आप भी जानते हैं।
खैर काटजू साहेब की पिटाई के समाचार ने काफी आनंद दिया। काटजू ,शोभा डे आदि लोग केजरीवाल टाईप हैं फोटो खिंचवाने के लिए "गौ "क्या ये लोग "गूँ " भी खा सकते हैं और साधारण लोग इनका मुकाबला नहीं कर सकते हाँ , मीडिया रुपी मक्खी को ये लोग पसंद आते रहेंगे।

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