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Sahitya Academy Award and Secular / किसान की मौत साहित्य को संजीवनी लगती रही

आजकल साहित्य अकैडमी अवार्ड बापिस करने की होड़ लगी हुई है ,सेक्युलर साहित्यकार काफी मुस्तैदी के साथ कम्युनलिज्म का बिरोध कर रहे हैं , अख़लाक़ जैसा सेक्युलर अगर मरता है तो साहित्यकार दुखी होता है लेकिन जब संजीव कुमार नाम का कम्युनल लड़का ,बिहार में मुस्लिम समुदाय द्वारा मार दिया जाता है तो ना सेक्युलर मीडिया खबर दिखाता है और  ना ही किसी  साहित्यकार को कष्ट होता है।
खैर, आज़ादी तो ज़रुर भारत को 1947 में मिली थी लेकिन अधिकतर पढ़ा लिखा वर्ग अंग्रेज़ों की मानसिक गुलामी आज भी करता रहा है उसमे विदेशों में पढ़े कांग्रेसी नेता जैसे खुर्शीद ,राहुल आदि तथा अधिकतर सेक्युलर साहित्यकार अब तो इनकी पहचान बड़ी आसान हो गयी है ! आज़ादी के बाद के अधिकतर भारतीय साहित्यकार अपराध बोध तथा हीन भावना से ग्रसित रहे हैं। पूरी दुनिया में  जितने भी महान प्रेरक हुए हैं वे एक ही बात कहते रहे हैं 'नज़र बदलो ,नज़ारे बदल जाएंगे ' ये छोटी सी बात अगर देश के सेक्युलर साहित्यकार नहीं समझ रहे हैं तो आम आदमी कैसे समझेगा।  एक साहित्यकार टी बी  बहस में कह रही थी "अख़लाक़ की मौत के बाद अब दम घुटता है इस देश में।  अच्छा लगा मुझे सुन कर लेकिन मन में  प्रशन उठा 'अख़लाक़ का साहित्य से क्या सम्बन्ध '? फिर एक दम से समझ में आ गया के साहित्यकार जो 'साहित्य पुरूस्कार बापिस कर रहे है इनकी विचार धारा क्या है।

अगर एक अख़लाक़ के मरने से साहित्यकारों का दम घुटता है तब तो हज़ारों किसानो की आत्म हत्या साहित्यकारों को तथा उनके साहित्य को  खत्म कर चुकी होती , दुर्भाग्यबश ऐसा नहीं हुआ और किसान की मौत साहित्य को संजीवनी लगती रही लेकिन एक 'नाम ' अख़लाक़ की मौत साहित्य का गला घोंट रही है।  बेटिओं के साथ समाज में हो रही जाजतियां साहित्य को   प्रेरक लगती  है लाखों कहानियाँ और नाटक  लिखे गए  और कमाई भी खूब करी गयी लेकिन कोई भी साहित्यकार ये  नहीं कह पाया के उनका" दम घुटता है " क्योंकि देश में बेटियां खतरे में हैं।
जनता के लिए  कभी भी कोई साहित्यकार खड़ा नहीं हुआ लेकिन आज अख़लाक़ ने साहित्य की मृत्यु कर दी। भारत के कुछ साहित्यकार आज भी हीन भावना के मारे हुए हैं , इनको हिन्दुओं की असहिष्णुता पर कष्ट होता है लेकिन चार्ली हिब्दों पत्रिका के ऊपर जब हमला होता है तब इन लोगों के मुहं में पान और हाथ में जाम आ जाता है ,और इनका  दम सिर्फ अख़लाक़ की मौत पे ही घुटता  है।  केरल में पिछले दिनों में कई हिन्दुओं की निर्मम हत्या हुई है लेकिन किसी मीडिया कर्मी या साहित्यकार को दुःख और कष्ट नहीं हुआ , बड़े अचम्भा की बात है

मुझे एक बात तो अपने पाठकों को बताते हुए ख़ुशी हो रही है के देश की सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है , क्योंकि मोदी का बिरोध तभी बहुत बढ़ता है जब वो तरक्की करता है या सही रास्ते पर होता है।  देश के असगंठित मज़दूरों के लिए पेंशन योजना ने बामपंथियों की नींद हराम कर दी है क्योंकि पहले वामपंथी सगठन मज़दूरों को सहयता देने के नाम पर बरगला लेते थे परन्तु अब मज़दूर बर्ग को सुरक्षा मिलने से बहुत बदलाब होगा , जरुरत है सिर्फ बीजेपी कार्यकर्ताओं को ये योजना हर एक मज़दूर तक पहुंचाने की।  ऐसे ही बेरोज़गार युबकों के लिए ऋण का प्राभदान जो भारत सरकार ने किया है , इस योजना को भी युवाओं तक धरातल पे पहुँचाना होगा।  ऐसा ना हो के कुछ पार्टी कार्यकर्त्ता ही इस योजना का फायदा उड़ा ले जाएँ जैसा के कांग्रेस राज में होता रहा है। आज का समय देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है बे -मतलब के साहित्यकारों पे समय बर्बाद ना करके कर्म को महत्व दें।

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