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Swami GitaNand ji Mahraj (VEER JI) ki ---- जीने की कला

 इरादा है   मर्दो का कोह-ए-गिरां ,पहाड़ अपनी जा से टलेगा कहाँ , जो तू है बहादुर समझ ले यही ,कि है 'तख़्त या तख़्ता 'मंज़िल मेरी। इरादा तेरा है जो सुलझा हुआ ,रहेगा न तू गम से उलझा हुआ। अगर बाज के पर हो आरास्ता  ,हवा में हर इक सिम्मत है रास्ता।   तू लफ्जों को कामों के  साँचे में ढाल ,नसीयत से बेहतर है अच्छी मिसाल। जो मन्जिल को जाना है सामान बाँध ,हवा के न दामन में अरमान बाँध। कोई है मुअज्ञ्ज्ज  ,कोई ख़्वार है , हर इक अपनी किस्मत का मेमार है। कलम खूब हो  रोशनाई हो खूब ,जो दिल खूब हो तो लिखाई हो खूब।  जमाना  गिरे को उठता नहीं,गिरा अश्क फिर हाथ आता नहीं , जो दिल अपना दुबिधा में पाता है तू ,तो उड़ता नहीं फ़ड़फ़ड़ाता है तू। तबीयत हो यकसू तो होता है काम ,कि दुबिधा में माया मिलेगी न राम। अगर कामयाबी न हो जी न छोड,गिरे भी जो सौ बार हिम्मत न तोड़। वो जीतेगा हो जिसका दिल उस्तवार ,वो हारेगा दिल जिसका जायेगा हार। न मौजों थपेड़ों को ला ध्यान में ,हो मीनार तूफान पुरनूर में। मुसीबत उठा और मुँह से न बोल ,कि एहरन है  मजबूत ओछा है ढोल। ...