मनुष्य अपना मित्र आप ही है और अपना दुश्मन भी आप ही है , ये बात भगवान श्री कृष्ण ने ज़ोर दे कर गीता में कही है। वैज्ञानिक शोध भी यह सिद्ध करते है। कई विद्यार्थी खूब पढ़ाई करते हैं ,दोहराते रहते हैं लेकिन परीक्षा में फिसडी साबित होते हैं, क्या कारण है ? कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है ?
जिन्होंने इसके ऊपर विचार किया उन्होंने कई तरह से कोशिश करके निष्कर्ष भी नकाले हैं , आपके लिए कुछ उदाहरण समर्पित हैं :-
कुछ विद्यार्थयों को थोड़े से शब्द रटने के लिए दिए गए , क्योंकि उनको ये शब्द लक्ष्य के रूप में दिए गए थे , 8 से 15 बार शब्दों को दोहराने से वे शब्द सभी को याद हो गए। परन्तु जब वही शब्द कुछ अन्य विद्यार्थियों को ऐसे ही याद करने के लिए दिए गए तो इन शब्दों को याद करने के लिए 75 से 100 बार दोहराना पड़ा। देखा - सिर्फ विद्यार्थियों की प्रगाढ़ इच्छा शक्ति इतना बड़ा अंतर् पैदा कर देती है।
स्कूल के कुछ छात्रों को ब्लैकबॉर्ड पे कुछ शब्द लिख कर अपनी कॉपी में उतारने के लिए दिए गए। फिर अचानक उनको बिना देखे शब्द लिखने के लिए कहा गया। अगले दिन छात्रों के एक अन्य समूह को वही शब्द लिखने के लिए दिए गए लेकिन साथ ही बता दिया गया कि जैसे ही शब्द कॉपी में लिख कर खत्म होंगे आपका टेस्ट होगा। अब शब्दों को लिखने का उदेश्य छात्रों के सामने था। दूसरे दिन वाले छात्रों को 25 %से 30 % तक अधिक शब्द याद हो चुके थे। सिर्फ उदेश्य सामने आते ही मस्तिष्क की कार्यक्षमता बहुत अधिक सार्थक परिणाम देती है।
एक और प्रयोग आपकी आँखे खोल देगा ,एक छात्र समूह को बेतरतीब लिखे हुए शब्द याद करने के लिए कहा गया। दूसरे छात्र समूह को भी वही शब्द याद करने के लिए दिए गए परन्तु साथ ही बताया गया कि 2 सप्ताह बाद उनका फिर उन शब्दों का टेस्ट होगा। याद करने के तुरंत बाद दोनों छात्र समूहों का एक साथ टेस्ट लिया गया तो लगभग एक जैसा ही परिणाम था। परन्तु 2 सप्ताह बाद के टेस्ट में काफी अंतर आया क्योंकि पहले छात्र समूह को बताया नहीं गया था टेस्ट के बारे में , इस लिए दूसरे छात्र समूह की परफॉर्मेंस बहुत अच्छी थी।
एक छात्र समूह को कुछ शब्द 100 -100 बार सुंदर लिखाबट के साथ लिखने का लक्ष्य दिया गया।
दूसरे छात्र समूह को भी वही काम दिया गया लेकिन उनको इस काम के दौरान सुंदर लिखाबट के लिए शबाशी देकर बार -बार तारीफ करके प्रोत्साहित किया। परिणाम आशा अनुरूप थे , प्रोत्साहन मिलने से छात्र समूह 2 का काम बहुत ही अच्छा था। जबकि पहले छात्र समूह ने काम तो पूरा किया लेकिन उनकी लिखाबट में कोई सुधार नहीं था जबकि दूसरे समूह को क्योंकि बार -बार प्रोत्साहित किया गया , शाबाशी दी गयी थी ,उनकी लिखाबट में बहुत अधिक सुधार देखा गया।
ये बात तो साफ है कि सीखने की सफलता , संकल्प पर ही निर्भर करती है। एक कारखाने में काम करने वाले लोगों की कार्यशैली में कोई बड़ा अंतर् नहीं आ पा रहा था। फिर कार्यकर्ताओं को बोला गया कि उनकी कार्यशैली के आधार पर उनकी तनख्वाह बढ़ेगी तथा तरक्की भी होगी। जल्दी ही कारखाने में काम करने वाले सभी कार्यकर्ताओं की कार्यशैली में क्रांतिकारी बदलाब आये। पहले कार्यकर्ताओं को पता था कि अच्छे काम का कोई ख़ास फायदा सैलरी या प्रमोशन में नहीं होगा इस लिए वे अधूरे मन से कार्य करते थे।
एक विचार पूर्ण उद्देश्य व्यक्ति की कार्य करने की गति , क्षमता तथा बढ़ने की भावना को कई गुणा बढ़ा देता है। उद्देश्य मनुष्य में तीव्र तथा लक्षित आकांक्षा पूर्ण करने में बहुत अधिक सहायक होता है। बच्चे या बड़े सभी में फर्क साफ़ नज़र आता है।
पहेलियाँ बूझना , एक शब्द वाले उत्तर याद करना भी मनुष्य की अपनी इच्छा शक्ति पर ही निर्भर करता है। इसका अर्थ है की भी व्यक्ति विचारपूर्ण संकल्प द्वारा अपनी कार्यक्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि कर सकता है।
कई लोगों की प्रॉब्लम होती है की उनको किसी का नाम जल्दी याद नहीं होता। अगर आप नाम याद करने के इच्छुक हैं तो नाम और चेहरे में सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए, जिससे जब भी वह चेहरा सामने आये आपको नाम याद आ जाए। देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी में ये गुण है , जिसको एक बार मिल लेते हैं फिर उसका नाम नहीं भूलते हैं। अब आप भी यह विद्या सीखना चाहते हैं नाम याद हो जाएँ ऐसा चाहते हैं तो आपको ध्यानपूर्वक , सचेत मन से एकाग्र हो कर अभ्यास करना होगा , यही आपकी सफलता का आधार बनेगा। सीखने के प्रति आक्रामकता तथा कृत संकल्प का आभाव ही अपूर्ण तथा असफल कोशिशों का कारण बनते हैं। यही कारण होता है की नित्य जिस काम को करते हैं उसमे निपुणता कोसों दूर दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर हाथ की लिखावट , शब्द या नाम याद न होना आदि। यह सिद्ध हो चुका है अगर किसी कार्य को बिना विचार के किया जाए तो उसका ख़ास असर नहीं होता , उन्नति नहीं होती।
जैसे ही आप उस कार्य को चनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और पूरी तन्मयता के साथ त्तलीनता के साथ अपने -आप को काम में झोंक देते हैं , आप मन माफिक परिणाम प्राप्त करने लगते हैं। मनुष्य तभी सीख सकता है जब वह दृढ़ संकल्प के साथ कोशिश कर रहा हो। अगर आप काम को बार - बार कर रहे हैं लेकिन उसमे सुधार की कोई इच्छा नहीं रखते , तो कोई क्रांति नहीं होगी ,बदलाब शून्य ही होगा। आपको अपने काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करना होगा फिर क्या फर्क पड़ता है खुद ही पता चल जायेगा।
जिन्होंने इसके ऊपर विचार किया उन्होंने कई तरह से कोशिश करके निष्कर्ष भी नकाले हैं , आपके लिए कुछ उदाहरण समर्पित हैं :-
कुछ विद्यार्थयों को थोड़े से शब्द रटने के लिए दिए गए , क्योंकि उनको ये शब्द लक्ष्य के रूप में दिए गए थे , 8 से 15 बार शब्दों को दोहराने से वे शब्द सभी को याद हो गए। परन्तु जब वही शब्द कुछ अन्य विद्यार्थियों को ऐसे ही याद करने के लिए दिए गए तो इन शब्दों को याद करने के लिए 75 से 100 बार दोहराना पड़ा। देखा - सिर्फ विद्यार्थियों की प्रगाढ़ इच्छा शक्ति इतना बड़ा अंतर् पैदा कर देती है।
स्कूल के कुछ छात्रों को ब्लैकबॉर्ड पे कुछ शब्द लिख कर अपनी कॉपी में उतारने के लिए दिए गए। फिर अचानक उनको बिना देखे शब्द लिखने के लिए कहा गया। अगले दिन छात्रों के एक अन्य समूह को वही शब्द लिखने के लिए दिए गए लेकिन साथ ही बता दिया गया कि जैसे ही शब्द कॉपी में लिख कर खत्म होंगे आपका टेस्ट होगा। अब शब्दों को लिखने का उदेश्य छात्रों के सामने था। दूसरे दिन वाले छात्रों को 25 %से 30 % तक अधिक शब्द याद हो चुके थे। सिर्फ उदेश्य सामने आते ही मस्तिष्क की कार्यक्षमता बहुत अधिक सार्थक परिणाम देती है।
एक और प्रयोग आपकी आँखे खोल देगा ,एक छात्र समूह को बेतरतीब लिखे हुए शब्द याद करने के लिए कहा गया। दूसरे छात्र समूह को भी वही शब्द याद करने के लिए दिए गए परन्तु साथ ही बताया गया कि 2 सप्ताह बाद उनका फिर उन शब्दों का टेस्ट होगा। याद करने के तुरंत बाद दोनों छात्र समूहों का एक साथ टेस्ट लिया गया तो लगभग एक जैसा ही परिणाम था। परन्तु 2 सप्ताह बाद के टेस्ट में काफी अंतर आया क्योंकि पहले छात्र समूह को बताया नहीं गया था टेस्ट के बारे में , इस लिए दूसरे छात्र समूह की परफॉर्मेंस बहुत अच्छी थी।
एक छात्र समूह को कुछ शब्द 100 -100 बार सुंदर लिखाबट के साथ लिखने का लक्ष्य दिया गया।
दूसरे छात्र समूह को भी वही काम दिया गया लेकिन उनको इस काम के दौरान सुंदर लिखाबट के लिए शबाशी देकर बार -बार तारीफ करके प्रोत्साहित किया। परिणाम आशा अनुरूप थे , प्रोत्साहन मिलने से छात्र समूह 2 का काम बहुत ही अच्छा था। जबकि पहले छात्र समूह ने काम तो पूरा किया लेकिन उनकी लिखाबट में कोई सुधार नहीं था जबकि दूसरे समूह को क्योंकि बार -बार प्रोत्साहित किया गया , शाबाशी दी गयी थी ,उनकी लिखाबट में बहुत अधिक सुधार देखा गया।
ये बात तो साफ है कि सीखने की सफलता , संकल्प पर ही निर्भर करती है। एक कारखाने में काम करने वाले लोगों की कार्यशैली में कोई बड़ा अंतर् नहीं आ पा रहा था। फिर कार्यकर्ताओं को बोला गया कि उनकी कार्यशैली के आधार पर उनकी तनख्वाह बढ़ेगी तथा तरक्की भी होगी। जल्दी ही कारखाने में काम करने वाले सभी कार्यकर्ताओं की कार्यशैली में क्रांतिकारी बदलाब आये। पहले कार्यकर्ताओं को पता था कि अच्छे काम का कोई ख़ास फायदा सैलरी या प्रमोशन में नहीं होगा इस लिए वे अधूरे मन से कार्य करते थे।
एक विचार पूर्ण उद्देश्य व्यक्ति की कार्य करने की गति , क्षमता तथा बढ़ने की भावना को कई गुणा बढ़ा देता है। उद्देश्य मनुष्य में तीव्र तथा लक्षित आकांक्षा पूर्ण करने में बहुत अधिक सहायक होता है। बच्चे या बड़े सभी में फर्क साफ़ नज़र आता है।
पहेलियाँ बूझना , एक शब्द वाले उत्तर याद करना भी मनुष्य की अपनी इच्छा शक्ति पर ही निर्भर करता है। इसका अर्थ है की भी व्यक्ति विचारपूर्ण संकल्प द्वारा अपनी कार्यक्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि कर सकता है।
कई लोगों की प्रॉब्लम होती है की उनको किसी का नाम जल्दी याद नहीं होता। अगर आप नाम याद करने के इच्छुक हैं तो नाम और चेहरे में सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए, जिससे जब भी वह चेहरा सामने आये आपको नाम याद आ जाए। देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी में ये गुण है , जिसको एक बार मिल लेते हैं फिर उसका नाम नहीं भूलते हैं। अब आप भी यह विद्या सीखना चाहते हैं नाम याद हो जाएँ ऐसा चाहते हैं तो आपको ध्यानपूर्वक , सचेत मन से एकाग्र हो कर अभ्यास करना होगा , यही आपकी सफलता का आधार बनेगा। सीखने के प्रति आक्रामकता तथा कृत संकल्प का आभाव ही अपूर्ण तथा असफल कोशिशों का कारण बनते हैं। यही कारण होता है की नित्य जिस काम को करते हैं उसमे निपुणता कोसों दूर दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर हाथ की लिखावट , शब्द या नाम याद न होना आदि। यह सिद्ध हो चुका है अगर किसी कार्य को बिना विचार के किया जाए तो उसका ख़ास असर नहीं होता , उन्नति नहीं होती।
जैसे ही आप उस कार्य को चनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और पूरी तन्मयता के साथ त्तलीनता के साथ अपने -आप को काम में झोंक देते हैं , आप मन माफिक परिणाम प्राप्त करने लगते हैं। मनुष्य तभी सीख सकता है जब वह दृढ़ संकल्प के साथ कोशिश कर रहा हो। अगर आप काम को बार - बार कर रहे हैं लेकिन उसमे सुधार की कोई इच्छा नहीं रखते , तो कोई क्रांति नहीं होगी ,बदलाब शून्य ही होगा। आपको अपने काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करना होगा फिर क्या फर्क पड़ता है खुद ही पता चल जायेगा।
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