हर में हरि हैं -- मत: परतरं नान्यत भवन्ति भावा भूतानां मतः एव पृथग्विधा। अर्थात गरज जानदारों में जो है सफास , है उन सबका मसबा मेरी पाक जात। इस दुनिया में जितने भी दरिंदे (beasts ),परिंदे (birds ),चरिन्दे (animals ), मनुष्य ,देवी -देवता आदि जिस शक्ति के कारण चल रहे हैं वह 'आत्मा 'भगवान जी की ही देन है। अगर आत्मा नहीं हो तो शरीर मुर्दा बन जाता है। शरीर सर्वथा आत्मा पर ही आश्रित होता है शरीर का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। शरीर नश्वर है खत्म होगा ही परन्तु आत्मा अजर अमर है अर्थात बना है जो बिगड़ेगा बे काल-ओ कील , कि खुद जिंदगी मौत की है दलील। हमे एकांत में बैठ कर गंभीरता पूर्वक मनन करना चाहिए कि :- वह कौन है 1) जिसके कारण से बुद्धि अपना निर्णय करती है 2 )जिसके कारण से मन संकल्प -विकल्प करता है 3 )जिसके कारण से तन का हर अंग अपना काम करता है 4 )जिसके कारण नाड़ियों में रक्त बहता है 5 )खाना खाने के बाद पचाता कोन है 6 )इस शरीर का प्रबंधक कोन है इस सब के उत्तर में भगवान् कहते हैं :- मैं जान -ए जहां जानदारों में हूँ संत कहते हैं जैसे आवाज सुनते -सुनते हम आव...