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How to Learn New Things or Tough Subjects Successfully ?मतलब ये है कि आप अपने बचपन में लौट जाइये अर्थात बच्चे बन जाइये

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जानवरों तथा मनुष्यों का सीखने का तरीका लगभग एक जैसा ही होता है।  जीवों के सीखने की प्रक्रिया ,'कोशिश और गलती अर्थात trial and error ' नियम पर आधारित होती है । सीखने वाले के लिए शुरूआती प्रयत्न किसी विज्ञानिक प्रयोग से कम नहीं होते। प्रारंभिक छोटी -छोटी कोशिशों से मनुष्य को सफलता के रास्ते की कठिनाइयों तथा अपनी कमियों का पता चलता है ,जिनको दूर करने के प्रयत्न वह आरम्भ कर देता है। शुरुआती प्रयत्न इतना तो समझा ही देते हैं कि वे कौन  से  तरीके हैं जिनसे लक्षित क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती और वह नए तरिके अपना कर अपनी कोशिशों को नए आयाम देना भी आरम्भ करदेता है। सीखना मानसिक दक्षता का आधार है।  हर सीखने वाले की दक्षता अलग -अलग होती है अतः सीखने के लिए कितना समय लगता है यह भी हर किसी की दक्षता पर ही निर्भर करता है। 

कौरव तथा पांडव गुरु द्रोणाचार्य जी के आश्रम में शिक्षा के लिए  गए।  गुरु जी ने पहला पाठ पढ़ाया "सदा सच बोलो " | अगले दिन गुरु जी ने पाठ सुनाने को कहा तो सिवाए युधिष्ठिर के सभी ने पाठ रट कर सुना दिया।  अगले दिन फिर वही हुआ। कई दिनों तक यही चलता रहा , फिर एक दिन गुरु जी ने युधिष्ठिर की पिटाई कर दी।परन्तु गुरु द्रोण हैरान थे कि युधिष्ठिर क्यों इतना समय  रहा है इतनी सी बात याद करने में।  उन्होंने संध्याकाल में युधिष्ठिर  को अपनी कुटिया में उपस्थित होने का आदेश दिया।  युधिष्ठिर पहुंचे , गुरु जी ने बड़े प्यार से पुछा "वत्स ,क्या बात है जो तुम्हें साधारण सा पाठ ही याद नहीं हो रहा ? मुझसे जो समझना चाहते हो समझ लो ,लेकिन कल कक्षा में पाठ सुना देना।  ये सुनते ही युधिष्ठिर ने गुरु जी के चरण पकड़ कर कहा "गुरु जी पाठ रटा हुआ तो है लेकिन जीवन में उतर नहीं रहा था , जीवन में पूर्णतया उतारने की कोशिश में इतना समय लगा है , आज जाकर पूर्णतया जीवन में आपके द्वारा दी गयी पहली शिक्षा 'सदा सच बोलो ' सफलता पूर्वक उतार पाया हूँ", अब मुझे जीवन में झूठ बोलने की कभी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।  सुनते ही गुरु जी भाव विभोर हो गए , युधिष्ठिर को गले लगाते हुए ,धर्मराज उपनाम दे दिया और कहा ,हे वत्स - तुमने आज सारे संसार को पाठ पढ़ा दिया है कि शिक्षा रटने से नहीं जीवन में उतारने से उधार होता है ,सफलता तभी प्राप्त होगी जब शिक्षा मनुष्य का जीवन बन जाए।  

इसलिए याद रखो , मनुष्य को शुरुआत में अभ्यास धीरे - धीरे ,शान्ति पूर्वक और निर्भयता से करते रहना चाहिए।  आरम्भिक प्रयत्नों में जल्दबाजी या तेज़ी बहुत ही अनुचित मानी जाती है तथा नासमझी की निशानी भी समझी जाती है। किसी भी शिक्षा ,गुण ,हुन्नर को सीखना जितना आसान लगता है उतना आसान होता नहीं है।  प्रारंभ में गलतियां होने स्वाभाविक है , इसलिए घबराना नहीं चाहिए। इस समय आपका लक्ष्य काम में दक्षता का नहीं बल्कि काम का अनुभव प्राप्त करने का है यानि उस कार्य को करते समय कैसा महसूस होता है बस , इतना ही लक्ष्य है , ये बात भूलना नहीं है वरना , आप हतोऊत्साहित महसूस करेंगे।  जो लोग नए कार्य , गुण या तकनीक को सीखने की प्रक्रिया  के प्रारंभ में ही पूरी रफ्तार से काम करने की कोशिश करते हैं , वे उस काम में सिद्धता प्राप्त कर पाएंगे असम्भव है।  लेकिन जिन लोगों ने शुरू में धीरे -धीरे , निश्चिन्त मन से प्रयत्न किये हैं , सीखने में तीव्रता नहीं दिखाई या उतवलापन नहीं दिखाया , ऐसे लगभग सभी प्रशिक्षर्थियों ने सफलता प्राप्त की है।  ये वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध किया है। 

सभी प्रकार के काम सीखने के लिए  प्रशिक्षार्थी में उत्साह अनिवार्य है परन्तु उताबलापन स्वीकार्य नहीं होता  ।  उत्साह और उताबलेपन में बहुत अधिक फर्क होता है।  उत्साही व्यक्ति कभी हार नहीं मानता लेकिन  उताबले  व्यक्ति का जोश जल्दी ही शांत हो जाता है।  इसलिए उताबलेपन से बचो , यह आपको नयी चीज़ें सीखने से रोकेगा क्योंकि शुरुआत में गलतियां भी होती हैं ,ठोकरें भी लगेंगी परन्तु उताबले व्यक्ति से ये सब सहन नहीं होता वो जल्दी हतोऊत्साहित हो जाते हैं।   आप उत्साहित होकर शांत मन से नए कार्य को प्रयोगात्मक भाव से करते जाएँगे  तो आपकी त्रुटियां भी आपको दुगुने उत्साह से भर देंगी।  आपकी गलतियां आपको सिखाती हैं कि कौन सा तरीका गलत है और कौन सा सही।  मान लो आप गणित या कोई अन्य विषय जो आपके लिए नया और कठिन है  सीखना शुरू करते हैं तो आपको जल्दबाजी में बहुत अधिक सीखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।  शुरू में गणित के आसान टॉपिक को सीखिए जिस से आपका मस्तिष्क तथा मन दोनों को गणित अच्छा लगने लगे , आप को गणित पढ़ने में आनंद आये।  शुरू में बहुत अधिक अभ्यास ,परिश्रम ,चिंतित मन से बार -बार दोहराने की कोशिश आपको जल्दी ही निरुत्साहित कर देगी ,फिर जल्द ही आप के लिए गणित पढ़ना किसी बोझ से कम नहीं होगा।  तुरंत परिणाम प्राप्त करने के चक्कर में आप, अपने ही शत्रु कब बन जाएंगे आपको पता भी नहीं चलेगा।  शुरुआत में आप आपने आप को पूरा समय दीजिये , अभ्यास नहीं सिर्फ प्रयोगात्मक कोशिश करिये, अपनी गलतियों और सफलताओ को भी एन्जॉय करिये ।  मतलब ये है कि आप अपने बचपन में लौट जाइये अर्थात बच्चे बन जाइये।  छोटे बच्चे को देखो जब पहली बार सोफ़े पे चढ़ने की कोशिश करता है तो बिलकुल शांत मन से धीरे - धीरे प्रयत्न करता रहता है और फिर एक -दो दिन की कोशिश जब सफल होती है तब कितना खिलखिला कर हँसता है और नाचता है , अपनी सफलता को एन्जॉय करता है , फिर जल्दी - जल्दी चढ़ना उतरना उसके लिए आसान हो जाता , परन्तु अगले ही पल वह पलंग पर चढ़ने की नयी कोशिश में जुट जाता है। बच्चे का उत्साह  ठंडा नहीं पड़ता चाहे जीतनी मर्जी बार असफल हो या गिरे , चोट लगे फिर भी कोशिश जारी रहती है , आपको बच्चा बनना होगा , बच्चे दुनियां के बहुत बड़े वैज्ञानिक होते हैं  लेकिन दिमाग पे बोझ ले कर नहीं घुमते क्योंकि उताबलापन नहीं होता ,उन्होंने कुछ सिद्ध नहीं करना होता।  इसलिए याद रखो - बाल मन से नए काम सीखेंगे तो सफलता के चांस बढ़ जाएंगे।   


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