"गनीमत समझ जिंदगी की बहार , के मानुष चोला नहीं बार -बार ,तू कर इस तरह बाग -ए -हस्ती की सैर ,की इंजाम जिस सैर का हो बखैर "
ये दोहे ख्वाज़ा दिल मुहम्मद साहेब के द्वारा लिखे गए हैं और हिंदी में अनुबाद स्वामी गीतानन्द जी (वीर जी ) गीतानगरी अम्बाला वालों ने किया है। स्वामी जी भगवान कृष्ण तथा गीता के महान अनुयाई और भक्त थे।लेकिन उन्होंने मुस्लिम विचारकों तथा संतों की बाणी को भी अपने साधकों साथ साझा किया और सर्वधर्म समभाव का सन्देश दिया।
भारत में हिन्दू धर्म सेक्युलर ज़मात के निशाने पर रहा है , पिछले दिनों में टी बी और अखबारों में काफी वक़्त हिन्दू धर्म की निंदा पे खर्च किया गया। मै हैरान होता हूँ के कॉर्पोरेट ट्रैनिंग्स तथा मोटिवेशनल पाठ पढ़ाने वाले लोग हर जगह एक ही बात दोहराते हैं के 'निंदा ' से बचो। गोस्वामी तुलसीदास जब रामायण लिख कर हटे तो किसी ने पुछा "गोस्वामी जी आपने रावण की निंदा और उसकी बात बहुत कम करी है ऐसा क्यों ? गोस्वामी जी ने बोला - रावण के अवगुण अगर मै बार-बार स्मरण करता तो वे सारे अवगुण जो रावण के थे तुलसीदास के हो जाते। " निंदा अगर हम किसी की करते हैं तो उनके अवगुण हमारे में आ जाते हैं , ये बात विज्ञानिक अनुसंधानों में तथा अनुभवों में साफ़ -साफ़ उभर करके आयी है।
खैर , मार्क ज़ुकरबर्ग और स्टीव जॉब्स के हिन्दू मंदिर में अनुभव ऐसे लोगों के लिए गुप्त ज्ञान से कम नहीं।
रामायण जी में तुलसीदास जी ने एक दोहा लिखा है "जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूर्त देखि तिन तैसी " हिन्दू धर्म के लिए भी ये बात बिलकुल सटीक बैठती है। सेक्युलर ज़मात हिन्दू धर्म को पानी पी -पी कर कोसती है और विदेशी लोग हिन्दू धर्म को जीवन सुधार का हथियार मानते हैं। है सिर्फ अनुभव की बात। अगर ऊपर लिखित दोहों को समझें तो पता चलता है के संत किसी भी धर्म का हो वो मनुष्य को सतर्क करने का काम करते रहे हैं। आज ज़रूरत है अच्छाइयों को उजागर करने की।
हिन्दू धर्म दुनिया का एक मात्र धर्म है जो मानता है "सभी धर्म एक समान हैं , सभी धर्मो के भगवान भी एक हैं"।
महांभारत के युद्ध के बाद भारत के लोगों ने घरों में डंडे रखने भी बंद कर दिए थे कारण ,इतना रक्त-पात देखने के बाद हथियारों से घ्रणा होना। भारतबासियों के DNA में युद्ध के बिरुद्ध इतनी घृणा हो गयी के जो भी आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण करता साधारण लोगों ने उन का बिरोध ही नहीं किया लूटते रहे -मरते रहे। महात्मा गांधी ने भी भारतीय स्वाभाव को भाप के 'मरने ' के लिए लोगों को तैयार किया बिना हथियार और लोग हज़ारों की संख्या में मरने के लिए उनके साथ हो लिए , चंद्रशेखर आज़ाद , सुभाषचन्द्र बॉस , भगत सिंह आदि क्रान्तिकारिओं ने भी लोगों का आह्वान किया लेकिन बहुत कम भारतियों को मारना पसंद आया , मरने के लिए तो जनता तैयार थी , मारने की लिए नहीं , यही हिन्दुओं का इतिहास है।
किसी भी जीव की जान बचाने की शिक्षा हिन्दू धर्म ने अपने अनुयाइयों के दिलों में कूट-कूट कर भरी हुई है , जीव ही क्यों पेड़ भी भगवान की तरह पूजे जाते रहे हैं ताकि पेड़ों को बिना मतलब ना काटा जाए ,परन्तु ये दोनों प्रथाएं हिन्दू धर्म का मज़ाक बनाने के लिए निंदकों ने प्रयोग करीं। अब अंग्रेजी में लिखने और बोलने वाले लोग जब यही जीव और पेड़ बचाओ अभियान मीडिया के साथ मिलकर चलाते हैं तो तारीफ होती है लेकिन हिन्दू धर्म की शिक्षा मज़ाक क्यों लगती रही समझ से परे है. सफाई हिन्दू धर्म में सर्वोच्च स्थान पे रही है सफाई के लिए नियम कड़े हैं हिन्दू धर्म में लेकिन उनका महत्त्व भी आधुनिक समाज ने मज़ाक ही समझा है

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