कुदरत का नियम है सभी एक दूसरे से सीखते हैं ,यहां मौलिकता का दावा कोई नहीं कर सकता। फिर सरकार के 'मेड इन इंडिया 'अभियान का बिरोध क्यों ? भारत सरकार ने दुनिया की सभी बड़ी कम्पनियो को भारत आकर निर्माण करने का न्योता दिया ,इसका फायदा सबसे पहले तो रोजगार के रूप में होगा , दूसरे हमारे लोग तकनीक भी सीख सकेंगे। 80 के दशक में HERO-HONDA,ESCORT-YAMAHA, TVS -SUZUKI आदि कम्पनियो ने भारत में काम शुरू किये थे। भारत और बिदेशी कम्पनियो के साझे उपकर्म थे ,उस समय भारत के लोगों के पास गाड़ियां बनाने की नई तकनीक नहीं थी। परन्तु आज दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल कंपनी "हीरो" भारत की है।
पेंटागन ,एप्पल तथा वोेइंग के साथ मिलकर ऐसे सैंसर तैयार कर रहा है जो सिपाही पहन भी सकें और जहाज की वाड़ी पर भी लगाए जा सकें। अब अगर भारत को ऐसा ही कुछ निर्माण करना है तो दो रास्ते है एक तो भारत के विज्ञानिक खुद ही खोज करें या भारत अमेरिकी कम्पनियो से सहयोग लेकर वर्तमान मांग को पूरा करें लेकिन भबिष्य के लिए भारतीय खोज जारी रहे। कई लोगों को प्रधानमत्री का विदेशी कम्पनियो के साथ मिलकर काम करने की नीति पर कड़ा एतराज है ,कुछ तो कहते है ,पहले भारत बनाओ फिर भारत में बनाओ। ऐसा कहने वाले लोग स्वय भू बुद्विजीवी है और सेकुलर मीडिया के लाडले भी है। परंतु जो बात या नीति, मुझ जैसे साधारण नागरिक को भी समझ आ रही है ,वही अधिक पढ़े लिखे लोगों को द्वंद डाले हुए है। अब स्वदेशी मंगल यान वनाने के लिए भारत के महान विज्ञानिक कई सालों से लगातार काम करते रहे तब जा कर आधुनिक भारत का परचम मंगल पर लहरा पाये ,लेकिन जब तक वे स्वदेशी तकनीक सृजित नहीं कर पाये थे तब तक विदेशी तकनीक का प्रयोग बंद थोड़ी कर दिया था। हमारा इतिहास वताता है के हमारे देश में रावण के 'पुष्पक विमान 'जैसे जहाज थे जिनकी गति 'मन की गति 'के सामान थी अर्थात जिस जगह के बारे में मन में सोचा वो जहाज के पलक झपकते ही बहां पहुँचता था ,अब क्या करे वोइग आदि कम्पनियो के जहाज का प्रयोग बंद करके तब तक जहाज का प्रयोग न करें जब तक स्वदेशी जहाज तैयार न हो , कैसी वचकना बातें अंग्रेजी पढ़े हुए लोग बोल रहे है।
हाँ , अगर विरोध करना है तब करो जब सरकार विज्ञानिकों को सुविधाएं ना दे या फिर देश के विज्ञानिकों को प्रोत्साहित ना करे। जब सरकार विज्ञानिको के सीखने का पूरा इंतज़ाम कर रही है तो विरोध क्यों , फिर तो मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है विरोधियों की मंशा पे।
पिछले 65 सालों से देश का शिक्षा का ढांचा कांग्रेस ठगबंधन ने तबाह कर दिया यही नहीं , आज अगर लोगों को बताओ के शिक्षा का तरिका सही नहीं है तो लड़ने दौड़ पड़ते हैं , मतलब कई पीढ़ियां बर्बाद कर दी गयीं गलत नीतियों को लागू करके , जनता को गलत भी ठीक लगता है।
दिल्ली चुनावों में केंद्र सरकार के उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारी मोदी के विरुद्ध हो गए थे क्योंकि मोदी ने दफ्तरों में बायोमीट्रिक यंत्र लगवा दिए और समय पे काम करने का दवाब बनाना शुरू किया था। दिल्ली चुनावों के दौरान समाज का ये पक्ष भी दिखा , जिसने देश के हित की बात की और ईमानदारी से काम की सलाह दी वही बुरा लगा लोगों को। परन्तु मोदी ने सुधार कार्य तो जारी रखे हुए हैं , अगर विरोध करना है तो गुणात्मक करो , सिर्फ निंदा के लिए नहीं , कमियां बताओ नीतियां लागू करने में सहायता करो क्योंकि देश आपका भी है।
अब देखो ना आज़ादी से पहले ही सुभाषचन्द्र बॉस के प्रति कांग्रेस ठगबंधन ने ज़ालिमाना नज़रिया रखा 15 महीने की सरकार 23 जनबरी 2016 को नेता जी से जुडी सभी फाइलें सार्बजनिक करने जा रही है। फिर भी लोग कहते हैं काम नहीं हो रहा।
ज़िन्दगी गुज़र जाती है ये ढूँढने में कि.....ढूंढना क्या है..!!
अंत में तलाश सिमट जाती है इस सुकून में कि... जो मिला.. वो भी कहाँ साथ लेकर जाना है .. !!

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