किसी संगठन या राजनितिक दल के सम्पूर्ण काडर को अगर बहादुरी का मेडल देने की बात चले तो मेरी पसंद कॉंग्रेसी होंगे। इस संगठन की नींव 1885 में भारतियों को राजनीतिक नेतृत्व दिलवाने की सोच से किया गया था। संगठन के लिए देश और देश की जनता सर्वोपरि थी , महात्मा गांधी , सुभाष चन्द्र बॉस , सरदार बलभभाई पटेल , लाल बहादुर शास्त्री आदि लिस्ट बहुत बड़ी है लगभग सभी महान बिभूतियाँ जो आज़ादी की जंग में शामिल थे ,कांग्रेस से भी जुड़े थे। अच्छा आज़ादी मिलते ही महात्मा गांधी ने मांग कर दी के कांग्रेस को भंग करदो क्योंकि देश आज़ाद हो चुका है और अब कॉंग्रस्स की ज़रूरत नहीं है। खैर , ये मांग नहीं मानी गयी और वक़्त के करवट लेते ही नयी कांग्रेस देश के सामने आ गयी , इस कांग्रेस में देश के लिए कोई जगह नहीं है और ना ही देश सेवा के लिए , एक और बात यहाँ नागरिक भी "भारतीय" ना होकर जाति -धर्म से पहचाने जाने लगे। देश के सभी महान सेवक कहीं गुम हो गए और सिर्फ एक ही परिवार देश का खैरख्वा हो गया , जी हाँ राहुल गांधी उसी परिवार की खेती हैं। वक़्त का फेर देखिये अब कोंग्रेसियों को देश या समाज से कोई सरोकार नहीं है उन्हें सिर्फ अपने नेता से मतलब है। यही बात मुझे कोंग्रेसियों की कायल करती है। अभी कल ही ममता बेनर्जी ने नेता जी सुभाषचन्द्र बॉस से जुडी 64 गुप्त फइलें सार्वजनिक करीं , फइलें जैसे-जैसे खुल रही हैं ऐसा लगता है कांग्रेसी नेताओं के कपडे उतर रहे हो , चाचा नेहरू का नया रूप भारत को दिखा ऐसा ही कोई खुलासा अगर बीजेपी के किसी नेता को लेकर होता तब तो मीडिया भी चुस्कारे लेले कर दिखाती ,क्योंकि बात चाचा से जुडी है इस लिए मीडिया कंफ्यूज है , परन्तु बहादुर कांग्रेसी नेता राहुल गांधी ने इस शर्मसार करदेने वाले खुलासे के बाद भी अपनी बिहार रैली रद्द नहीं की और मोदी को "फेंकू "उपनाम से मंच से सम्बोधित भी कर दिया । राहुल की बहादुरी 'पार्टीदानी' है , खानदानी कहता तो पार्टी समर्थकों की योग्यता छिप जाती। ये बात नेता की ही नहीं है , इतने बेइज़ती वाले खुलासे अगर लालू के होते मान माँ कसम लालू की औलाद भी भारत से भाग जाती , लेकिन जुझारू कांग्रेसी कार्यकर्ता बिना किसी शर्म के राहुल गांधी को उत्साहित कर रहे हैं वो भी राहुल के गुरु राजा दिग्विजय सिंह की गैर हाज़री में। आपको शायद नहीं पता दिग्गी बाबू नई शादी के बाद से ही नई पत्नी के साथ कहीं छुप्पे बैठे हैं , बोलने वाले का मुहं थोड़ी पकड़ सकते हैं सूत्र तो ये बता रहे हैं के दिग्गी बादशाह नारायण दत्त तिवारी की शरण में गए हुए हैं . खैर ,हमें क्या मतलब इन बातों से।
जो प्रमुख बात सामने उभर कर आई है वो है कोंग्रेसियों की पार्टी से बफादारी। अगर कोंग्रेसियों को ध्यान से देखो तो आप महसूस करेंगे कि एहसास तो होता है इनको लेकिन कभी सच का साथ ही नहीं दिया होता तो अपनी फीलिंग्स को अंदर ही घोट देते हैँ।
अंत में भारत की बहादुर कौम "कोंग्रेसियों " को प्रणाम है जिनका पार्टी से और नेताओं से अभी भी मोह भंग नहीं हुआ जबकि आज देश में अंग्रेज़ों के पिठू के रूप में चाचा जी प्रसिद्धि पा रहे हैं।
जो प्रमुख बात सामने उभर कर आई है वो है कोंग्रेसियों की पार्टी से बफादारी। अगर कोंग्रेसियों को ध्यान से देखो तो आप महसूस करेंगे कि एहसास तो होता है इनको लेकिन कभी सच का साथ ही नहीं दिया होता तो अपनी फीलिंग्स को अंदर ही घोट देते हैँ।
अंत में भारत की बहादुर कौम "कोंग्रेसियों " को प्रणाम है जिनका पार्टी से और नेताओं से अभी भी मोह भंग नहीं हुआ जबकि आज देश में अंग्रेज़ों के पिठू के रूप में चाचा जी प्रसिद्धि पा रहे हैं।

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