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मोदी सरकार के लिए बदलाब कठिन है नामुमकिन नहीं

पर्यावरण के विषय में   काफी बातें और योजनाएं तैयार हो रही हैं।  सुनने में आ रहा है केंद्र सरकार अब जंगलों की देख रेख प्राइवेट कंपनियों या संस्थाओं के हाथ देने वाली है ,ऐसी सुगबुगाहट सुनने को मिल रही है। देखा जाए तो सरकार के पास बिकल्प हैं भी नहीं।  वन विभाग जो वनों को बचाने की सोच के साथ बनाया गया था , वनों को काटने या यूँ कहें लूटने का सबसे बड़ा विभाग बन गया है।  हम देश के किसी भी हिस्से में चले जाएँ आज लोग अपने निजी फायदे को ही सर्वोपरि रख रहे हैं , यही हाल सरकारी अधिकारियों का भी है तो उनको भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि समाज का प्रभाव ही तो उन पर पड़ा है। कल ही एक सेवा निवृत मुख्याध्यापक जी से बात हो रही थी उन्होंने बताया के शिमला हाई कोर्ट में किसी केस के सिल सिले में गया हुआ था तो वकीलों के साथ बात चल पड़ी , शाम का समय  था महफ़िल में नशे का सुरूर चढ़ने लगा था , एक वकील साहेब मेरे मुरीद हो गए और नज़दीक आकर बोले "हेडमास्टर साहेब आप केस जीत सकते हैं , आजकल जो जज हाई कोर्ट में है उसे लड़कियों का शौक है इधर उसके पास लड़की पहुंची उधर आप केस जीत गए।  एक और  वकील बातचीत में कूद पड़ा बोला आजकल शिमला में वकीलो को  वकालत कम , दलाली ज्यादा करनी पड़ रही है। " ऐसे ही बातें होती रहीं , फिर तो सभी ने जो भी महफ़िल में बैठा था अपने-अपने अनुभव या सुनिसुनाई बातें बताईं ।  खैर हेडमास्टर जी वो केस हार गए , क्योंकि  उनका ज़मीर जज की ज़रूरत पूरी करने में असमर्थता जाहिर कर चुका था।  ये कोई कहानी नहीं कड़वा सच है जो आपके जीवन में कभी ना कभी किसी रूप में घटित होता है डॉक्टर -  कलर्क -पटवारी -  पुलिस -फ़ौज  - नेता - ठेकेदार -इंजीनियर आदि कहीं पे भी सेवा की  मांग आ सकती है क्योंकि अधिकतर भारतीय अंग्रेजी के कायल हैं और अंग्रेज़ियत उनके खून में है, नतीज़तन अंग्रेज़ों की तरह अपने ही देश को लूट रहे हैं , क्योंकि अंग्रेज़ों की नक़ल करते -करते  हैं ये बात  भूल गए की अँगरेज़ भारत से लूट का सामान  इंग्लैंड ले गए थे , उनका देश भारत नहीं था वे इंग्लैंड के लिए भारत को लूटते रहे परन्तु भारत के स्थानीय लोग जो देश को लूट रहे हैं उनका देश तो भारत ही है वे कहाँ जाएंगे लूट का सामान लेकर समझ से पर है।
आज सबसे अधिक ज़रूरत साधारण नागरिक को  समझने की है के "भारत हमारा देश है " शब्दों में नहीं कर्मो से इस बात को सिद्ध करना पडेगा। खैर , प्राइवेट कंपनियों पे भी आँख मूँद के बिश्वास नहीं किया जा सकता।  उदाहरण के तौर पे स्किल डिवेलपमेंट में ही देख लो - डॉक्टर रेड्डी फाउंडेशन या आईक्या ग्लोबल आदि समाजसेवी संस्थाएं सरकार से करोड़ों रुपये बेरोज़गारों की ट्रेनिंग और प्लेसमेंट के नाम पर ले लेती हैं लेकिन सचाई रिपोर्टों के ढेर के नीचे दवा दी जाती है।  ये विडिओ https://www.youtube.com/watch?v=EX5X3tzl8Io,
https://www.youtube.com/watch?v=ODSmm6tu9c0,
आप एक बार देखें मैंने कोशिश करी है क्वालिटी अच्छी नहीं है लेकिन एक बार देखि-सुनी जा सकती है।  ये ही नहीं भारत की सरकारें ऐसी कंपनियों को सरकारी स्कूलों के ठेके भी देती रही है , मगर ये संस्थाएं भारतीय होते हुए भी समाज सेवा को व्यापार से अधिक कुछ नहीं समझ पाईं ,अगर इन संस्थाओं में काम करने वाले
लोगों से आप बात करेंगे तो पाएंगे उनके लिए ये काम नग या टारगेट पूरा करने से अधिक कुछ नहीं होता ,जैसे  प्राइवेट अस्पतालों के डॉक्टर और नर्स आदि के लिए अस्पताल में आया हुआ मरीज़ बकरे से अधिक कुछ  नहीं दिखता , बस पैसे की तरफ ही नज़र होती है ,कई बार तो पैसे के लिए मरे हुए मरीज़ को वेंटीलेटर पर कई -कई दिन लेटा कर पैसे लुटे जाते हैं।
 दूसरी तरफ सरकारी तंतर भी इसी परपाटी पर चल रहा है , हिमाचल में पुलिस की भर्ती हुई 7500 रुपए पगार पर। ऐसे ही सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर रखे गए 12000 -15000 रुपए सैलरी पर। पटवारियों की भर्ती हो रही है जिसमे 2 साल के लिए 3000 रुपए पगार या स्टाईफण्ड दिया जाएगा।  हाहाहाहाहा अब ईमानदारी से ये लोग कैसे काम करेंगे क्योंकि आजकल नौकरी जॉइन करने से पहले सैलरी पर नज़र होती है अब ये लोग कम सैलरी को बढ़ाने के लिए बेईमानी तो करेंगे ही। सरकार चाहती है के लोग बेईमानी करके खर्चा निकाल ले और सरकार का काम भी पूरा  हो जाये। हरियाणा ,उत्तर प्रदेश ,राजस्थान ,मध्यप्रदेश आदि सभी प्रदेशों में शिक्षक भर्ती में अनियमित्तता वर्ती गयी है लेकिन इस सब में जिन लोगों को नौकरी मिली हुई थी अगर उनकी नौकरी चली जाए तो उस परिवार का गुज़ारा कैसे हो गा ? ये बात जज भी नहीं सोचते ,नेता तो खैर कोई सोच रखते  ही नहीं।  अच्छा, कोर्ट के दोहरे माप -दंड देखो हिमाचल प्रदेश में पहाड़ के कुछ मंदिरों में पशु बलि दी जाती थी लेकिन कोर्ट ने वैन करदी ,  हम लोग तो खुश थे लेकिन अभी हाल ही में मुंबई में मांस बिक्री की रोक  पर कोर्ट ने फैसला दिया के "कबीरा तेरी झोपड़ी गल कटियन के पास , करन गे सो भरण गे तूं क्यों होया उदास "
सरकार शाकाहार थोप नहीं सकती। पशु मारना गलत है लेकिन लोगों को जबरदस्ती रोका नहीं जा  सकता।  हिमाचल में बंदरों को मारने की तैयारी की जा रही है लेकिन बंदरों के जंगलों को बदरंग वालों के खिलाफ कोई कानून नहीं फैसला नहीं। बन्दर फसल का नुक्सान कर रहे हैं इस लिए उनको मारदो परन्तु उस समाज और सरकार को क्या सज़ा होनी जिसने जंगलों को तहस -नहस करके वन जीवों का जीना ही दूभर कर दिया ?
हाहाहा …… भाई ऐसे ही बहुत से उलझे हुए प्रशन हैं द्वन्द हैं जिनका मोदी को उत्तर ढूंढ़ना है  वक़्त तो लगेगा ही ,हम अपना घर ही संभाल नहीं पाते हैं और मोदी सरकार को ऊपर लिखे सभी ;गलत चीज़ों को ठीक करना है।
स्वच्छ भारत अभियान सिर्फ कूड़े की सफाई से  जुड़ा हुआ नहीं मान लेना चाहिए बल्कि गलत परिपाटी को बदलने  से भी जोडा जाना चाहिए  और हम सभी को  जुड़ना भी चाहिए।

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