युवा मन की उड़ान हिमालय से ऊंची हो सकती है और प्रशांत महासागर की गहराइयों से भी गहरी हो सकती वशर्ते युवा सेवा ,साधना और स्वाभिमान को जीवन में उतार चूका हो। आजकल अधिकतर लोगों को कहते सुना जा सालता की 'इस सिस्टम का कुछ नहीं हो सकता ,सदियों से इंसान और समाज ऐसा ही रहा है कई लोगों ने कोशिश करि लेकिन समाज नहीं बदला। हा हा हा....... कितना भयंकर मज़ाक और नामसझी भरा नादान इंसान है , भाई जितने भी महान लोग हुए या समाज को सुधारने वाले हुए सभी ने अपने काम से , अपंने कर्म से ही शिक्षा दी है। जिस भी इंसान की बात को समाज अनदेखा कर रहा है सच तो ये है की वो इंसान खुद अभी कच्चा है और कच्चे फल किसी को पसंद नहीं आते फिर ये तो बातें हैं। जब तक आपके जीवन में ईमानदार कोशिश नहीं होगी आपको कोई नहीं सुनेगा। अगर कोई अपवाद हो तो बात अलग है। आपको कर्म योग को जीवन में उतरना होगा , उसके परिणामस्वरूप आपके शब्दों में 'बज़न ' होगा और बजनयुक्त शब्द चाहे ए पी जे अब्दुलकलाम के हों या भगत सिंह के चाहे नरेंदर मोदी के हों या महात्मा गांधी के सभी को एक जैसा सम्मान मिलेगा और प्रभाव भी हज़ारों सालों तक रहेगा। इस लिए मत्व पूर्ण बात है 'कर्म ' भारत में तो इंसान की जाती कर्म अनुसार थी बाद जन्म आधारित हुई। आज भी इंसान के कर्मो के अनुसार भीमराव आंबेडकर , कबीर , रविसदास , ए पी जे अब्दुलकलाम, नरेंद्र मोदी आदि जिनकी जन्म अनुसार जाती या धर्म उनकी महानता के आगे गौण हो गए। अपने आप में ये लोग धर्म की उपमा हो गए। इसलिए अपने जीवन में अगर युवा 'कर्म ' को तरजीह देने लग जाएँ तो उनकी उड़ान की कोई सीमा नहीं होगी और जैसा चाहे वैसे समाज और देश का वे निर्माण कर सकेंगे। 

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