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हम अपनी आने वाली नस्लों के लिए क्या संस्कार छोड़ कर जायेंगे ?

हमारे समाज में जो भी बुराई बढ़ी है उसका सीधा प्रभाव बच्चों पर पड़ा है,उनका संस्कार  बदल गया परिणाम स्वरुप व्यवहार बदल गया और सीधे सीधे कहें तो ये संसार बदल गया।  एक दिन यूँ ही सड़क के किनारे खड़ा था तो कुछ लोग आपस में बातें कर रहे थे - सबसे मुखर आवाज में बात करने वाले भाई साहेब दिल्ली में रहते थे और गांव में अपनी खानदानी ज़मीन ढूंढने आये हुए थे ताकि बेच कर पैसा कमा सकें।  उन भाई साहेब के बच्चे अच्छी नौकरियों पे हैं खुद भी अछि कमाई करते हैं लेकिन पुरखों की थोड़ी बहुत ज़मींन जो पैतृक गांव में थी उसे बेच कर अपने सुख में बृद्धि करने की कोशिश में थे।  दुसरे भाई साहेब होशियारपुर में रहते थे और उनका भी टारगेट दिल्ली वालों जैसा ही था , लेकिन उनका लॉजिक थोड़ा अलग था ,वे कह रहे थे मेरी दो बेटियां हैं , मेरे बाद पैतृक ज़मीन को कौन देखे गा और बड़ी बात है की गांव की ज़मीन बेच कर अपनी बेटिओं की शादी धूम धाम से करेंगे और कुछ पैसा अपने बुढ़ापे के लिए भी जोड़ कर रखेंगे।  तीसरे भाई साहेब चंडीगढ़  में रहने वाले थे वे भी पैतृक  जमीन की खोज में आये हुए थे लेकिन उनका विचार था की ज़मीन की तारबंदी करदेंगे ताकि उनके बच्चे जब भी कभी गांव में आएं उनको ज़मीं ढूंढने में दिक्कत न हो।  चौथे व्यक्ति जो खुद पैतृक ज़मीन बेचने की गलती कर चुके थे, सभी को समझाने की कोशिश कर रहे थे जो कि बाकियों द्वारा लगातार नज़रअंदाज की जा रही थी।  खैर , चौथे बज़ुर्ग की बातें बहुत सच्ची थीं , वे बता रहे थे की कैसे उन्होंने अपने बच्चों के सुख के लिए बहुत काम किये , ज़िन्दगी भर की कमाई और ज़मीन का पैसा भी अपने बच्चों के ऊपर खर्च किया , और अब जब वे बज़ुर्ग हो रहे हैं तो उनकी औलाद अपने को तथा अपने बीबी और बच्चों को अलग परिवार बता कर माता पिता से दूर जा चुके हैं।  रुंधे हुए गले से जब वे अपनी बात सभी के साथ शेयर कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि जैसे पूरा वातावरण ग़मगीन हो गया है।  अपनी बात को बढ़ाते हुए उन्होंने कहा की ऐसा नहीं है सिर्फ बेटे ही गलत सोच रखते हैं उनकी बेटी भी जब आती है तो सब कुछ बटोरने की इच्छा से ही आती है।
समाज का भयाभय सच सुनकर दिल जोर से धड़कने लगा था मेरा , लेकिन उन बज़ुर्ग ने बात आगे बढाई बोले 'इस सब के लिए मै बच्चों को दोष नहीं दूंगा क्योंकि मैं भी जवानी में अपने माता -पिता के साथ ऐसा ही व्यवहार कर चूका हूँ इसलिए मुझे बच्चों के व्यवहार से दुःख नहीं होता वल्कि अपने व्यवहार पे मलाल है जो मैंने जवानी में अपने माता-पिता और भाई -बहनो के साथ किया।  मैंने पैतृक ज़मींन जो मेरे हिस्से की थी सभी के बिरोध के बाबजूद अच्छे दामों से बेच कर अपने कर्मो से सभी के सामने श्रेष्ठ सिद्ध किया , लेकिन मेरी मूर्खता को मेरे पिता जानते थे उन्होंने मेरे हिस्से की कुछ ज़मीन मुझे बिना बताये छोटे भाई के हवाले की हुए थी और उसे हिदायत दी थी की जब तुम्हारे बड़े भाई को बहुत ज़रुरत मह्सूस होगी तभी इस ज़मीं के बारे में उससे बताना।  मेरा छोटा भाई बीमार है तो उसने मुझे उस ज़मीन के बारे में आज बताया और कहा की अब आप सम्भालो।  मेरे पास आँखें नीचे करके पश्ताने के इलावा कोई चारा नहीं था।  लेकिन अब मैं वो ज़मीन अपने छोटे भाई को ही दे कर आया हूँ , उससे लिख कर दे दिया है और कागज़ तैयार करने के लिए बकील को भी बोल दिया है। हमारे बज़ुर्ग बहुत वर्ष पहले ही दुनियां से रुखसत हो चुके है लेकिन उनके कर्म आज भी हम लोगों को सुख दे रहे हैं परन्तु आने वाली पीढ़ियों को हम क्या संजो कर दे जाएंगे ? भरी हुई आँखों के साथ वे बस में चढ़ कर रुखसत हुए लेकिन उनकी बात आज भी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती है की हम अपनी आने वाली नस्लों के लिए क्या संस्कार छोड़  कर जायेंगे ?

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