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पवित्रता (purification ) से एकाग्रता (concentration ) प्राप्त होगी , एकाग्रता से मनन (meditation/thinking )की योग्यता आती है जिसका परिणाम होती है अनुभवावस्था (realization)

"जब तलक अपनी समझ इंसान को आती नहीं , तब तलक दिल की परेशानी कभी जाती नहीं" - स्वामी राम तीर्थ
                                  सभी बातें सुनने या पढ़ने से ही बदलाब नहीं आता।  बदलाब को इंकलाब भी कहते हैं और आप जानते हैं इंकलाब आसान नहीं होते। कोई भी गुण जो हम अपने में चाहते हैं उसका लगातार मनन , तथा अभ्यास करना पड़ता है। अपना अहंकार छोड़ कर मिट्टी के साथ मिटटी होना पड़ता है जैसे किसान को होना पड़ता है मटियामेट , वैसे ही उस विचार पर एकाग्र हो कर जीवन में उसे उतारने की लगातार कोशिश करनी होगी साथ ही भगवान् से प्रार्थना तांकि सफलता मिले। इसके लिए हर तरफ से ध्यान समेट कर एक ही विचार पर केंद्रित करना होता है। आसान नहीं होगा ये काम ,कोई सूरमा ही होगा जो ये कर पाता है।
                                       याद रखो जो बस्तु जीतनी अधिक कीमती होगी उसे प्राप्त करने के लिए उतनी ही कड़ी मेहनत अर्थात पुरुषार्थ करना पड़ता है।  खेती करने के लिए खेत की जुताई -गुड़ाई जरुरी है ,अवांछित घास -फूस छांट करके खाद पानी का इंतज़ाम करके फिर फसल की बुआई होती है। बिना चीनी की चाय कड़वी ही लगेगी ,लेकिन जैसे जैसे उसमे चीनी मिलाते जायेंगे चाय अपने आप मीठी होती जाएगी।  उसी तरह जीवन में गुण उतरने पर ज्ञान भी जीवंत ढंग से जीवन में उतरने लगेगा।  आप आस्तिक हैं या नस्तिक ये फर्क नहीं पड़ता सिर्फ गुणों का महत्व है सफलता के रास्ते में।
                                            ज्यों -ज्यों अंतःकरण में गुण आएंगे अंतःकरण निर्मल होता जायेगा , और निर्मल मन ही एकाग्रता प्राप्त करता है

ये हैं महत्व पूर्ण पड़ाव :-

पवित्रता (purification ) से एकाग्रता (concentration ) प्राप्त होगी , एकाग्रता से मनन (meditation/thinking )की योग्यता आती है जिसका परिणाम होती है अनुभवावस्था (realization)  

इसलिए सफलता का पहला सूत्र है पवित्रता ,निश्छल मन , बाल व्यवहार ,शुद्ध जो जोड़-तोड़ ,हानि -लाभ के बंधनो से परे हो। एक छोटे बालक की तरह का अंतः करण। भगवान जो भी गुण सफलता के लिए बताते हैं वे छोटे बालकों में सहज ही होते हैं उनमे से पहला है :-

अमानित्वं  अर्थात मान (प्रतिष्ठा ,इज्जत या prestige ) की इच्छा न रखना 

मान की इच्छा किसी भी भद्र  मनुष्य की अंतिम त्रुटि या दुर्बलता कही जाती है। ( Fame is the last infirmity of a noble mind)
इसके बारे में कबीर जी कहते हैं "घर का तजना सहज है ,सहज त्रिया का नेह 
                                                 मान बड़ाई ईर्ष्या , तजनी दुर्लभ हेय "
परन्तु सफल जीवन के लिए मान /प्रतिष्ठा की इच्छा त्यागनी आवश्यक है। खुद को औरों से श्रेष्ठ समझने वाला ही मान या बड़ाई की इच्छा रखेगा अर्थात जितना अधिक 'मैं 'और 'मेरे' का साम्राज्य होगा उतना ही अपने को इज्जतदार समझेगा अर्थात जितना अधिक अहंकार होगा उतना अधिक मान की लालसा होगी। ये बुरा  इसलिए है क्योंकि जिसे मान चाहिए होगा उसे बहिर्मुखी होना पड़ेगा ,लोगों की हाँ में हाँ मिलनी पड़ेगी ,तलवे चाटने पड़ेंगे बेमतलब की बातों में समय नष्ट करना पड़ेगा।

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