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satya meve jayte 3 / सत्य मेव जायते by amit vashist

केंद्र सरकार अगर संस्कृत को पढ़ाने की पहल कर रही है तो बधाई की पात्र है संस्कृत से संस्कृति शब्द बना मतलब साफ़ है सनातन संस्कृति तब तक सुरक्षित नहीं जब तक संस्कृत हमारे बच्चों को ना पढाई जाये . मित्रो विज्ञान कहता है के संस्कृत दुनिया की अकेली ऐसी भाषा है जिसे पढने से छात्र के दिमाग के दोनों भाग समान रूप से काम करते हैं अर्थात संस्कृत पढने वाले छात्र का सर्वांगीण विकास सिर्फ संस्कृत पढने मात्र से ही हो जाता है , ये मैं नहीं आज का विज्ञान कहता है , इस बात का उल्लेख तो हमारे संत बार बार करते आये हैं और बापू आसाराम जी उन संतों में से एक हैं जिन्हों ने इस बात को अपने शिष्यों को कई बार सत्संगों में दोहरा क्र पक्का किया . बापू का कहना है के संस्कृत शब्द के पहले शब्द "सं" से संस्कार , संसार , संयम , सन्मार्ग ,संतोष आदि अनंत शब्द व् विचार निकले हैं , अमेरिका या जर्मन -यूरोप के विज्ञानिको ने इस बात को मान कर संस्कृत का अध्यान गहराई से किया जिसके परिणाम स्वरूप वर्तमान समय में हो रही खोजों को वे अपना नाम देने में कामयाब भी हुए हैं , अगर भारत के बच्चे संस्कृत पढ़तेहैं उनका सर्वांगीण विकास होता है जिसका फयाद्दा देश और समाज को प्रतिभावान युवायों के रूप में मिलेगा, खैर अगर केंद्र सरकार ये फैसला लेती है तो सच मानिये ये फैसला देश के बच्चों पे उपकार से कम नहीं है . संस्कृत पढने के लिए छात्र को एकाग्र होना बड़ा ज़रूरी होता है , बिना एकाग्रता के कोई भी इंसान संस्कृत पढ़ ही नहीं सकता , ये ज्ञान हम्मरे ऋषि-मुनिओ को था तभी तो गुरुकुलों में संस्कृत पाठ तथा देसी गौ-पालन पे जोर दिया जाता था . जी हाँ देसी-गौ का दूध अम्रत माना गया है . आपको याद होगा पिछले काफी समय से अमेरिका के राष्ट्रपति चाहे बुश हो या ओबामा सभी को यी बात डरावनी लगती है के भारत के बच्चे आजकल पढाई में खूब आगे निकल रहे है , आपको ये बात भी पता होगी के अमेरिका में संस्कृत भाषा पाठशालाओं में पढ़नी शुरू हो चुकी है , अगर अमेरिका में संस्कृत पढाणी शुरू हुई है तो आपको ये बात तो समझ में आ रही होगी के इस भाषा का कितना महत्व है आज के युग में , फेसबुक पे एक मित्र ने ऐसे ही विचार लिख कर शेयर किये थे आप के लिए वैसे के वैसे ही शब्द हैं पढ़ें और विचार करें :- ब्रेकिन्ग न्युज..... उन्हे जर्मन या संस्कृत से उतना लेना देना नहीं है जितना कि इस बात का डर सता रहा है कि स्कूलों मे जिस theorem को Pythagorus का पढ़वाया है, जिस पाई की value को egyptian की खोज बताया है, जिस परमाणु सिद्धान्त को डाल्टन का बताया है, जिस Binomial equation के formula को रोमन खोज बताया है, उसकी जगह लोग क्रमशः बौद्धायन, आर्यभट्ट , कणाद और श्रीधर का नाम लेने लगेंगे क्योंकि इन बातों पर भारतीयो की खोजें इनकी तुलना मे सैकड़ो-हजारों वर्ष पहली की हैं...!! यही नहीं इन्होने बच्चो को जो आधुनिक राजनीति का जनक मैकियाविली को पढ़ाया है, लोग मैकियाविली से हजारो साल पहले उन्ही सिद्धांतों को बता देने वाले चाणक्य का नाम लेने लगेंगे..!! इन्होंने अलेक्जेंडर, अकबर महान पढ़ाया है लोग उनके अमानवीय चेहरों से परिचित हो जाएंगे..!! असली समस्या इन बातों से है..!! इनके रग रग मे भरी विदेशियों की चाकरी और चाटुकारिता की सोच पर चर्चा करना तो केवल समय जाया करना के अलावा कुछ नहीं होगा...!!! अरुण शुक्ला की कलम से है ये साभार See Translation

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