मैं एक दिन अपने छात्रों के साथ बात कर रहा था और साधारण बातचीत कैसे गंभीर होती चली गयी पता ही नहीं चला। बातचीत की शुरुआत बच्चों को देख कर या उनसे सीख कर हम बड़े लोग कैसे सुखी रह सकते हैं इस मुद्दे पर हुई। सारा माहौल बोझिल हो गया , दुःख से भर गया जब एक छात्रा (रीना) ने अपने पड़ोस में रह रही एक वर्ष की बच्ची की दास्तान सुनाई।
लगभग 5 महीने पहले अर्थात जब छुटकी सिर्फ 7 महीने की थी तब उसकी माता और पिता उसे दादा -दादी के पास छोड़ कर न्यूज़ीलैंड चले गए हैं। 7 महीने की बच्ची सभी को ढूँटति थी, अपनी माँ को सबसे अधिक। नम आँखों और उदास चेहरे से कुछ दिन निरीह गुड़िया हर तरफ टकटकी लगा कर देखती रहती , फिर एक दिन रीना ( मेरी छात्रा जिसने ये घटना सुनायी) उनके घर गयी किसी काम से , रीना ने गुड़िया को जैसे ही गोदी में उठाया, उस नन्ही परी ने जोर से किलकारी मारकर 'माँ ' कहा और उसके सीने से लिपट गयी। किसी भी ज़िंदा इंसान के लिए दुधमुँहे बच्चे का ऐसा निःस्वार्थ प्रेम आनंदित करने वाला होता है लेकिन आज रीना बहुत ही दुखी और उदास हो गयी उस नन्ही राज कुमारी को गोदी में उठाये -सीने से लगाए अपने आंसुओं को पलकों में छिपाये बोझिल मस्तिष्क के साथ अपने घर ले गयी। फिर गुड़िया की दादी ने दूध की बोतल देते हुए कहा ' बेटा ये दूध पीला कर देख अगर पी ले ,जब से इसके माँ -बाप गए हैं इसने दूध पीना भी कम कर दिया था ,रोती भी कम ही थी लेकिन हंसती तो बिलकुल ही नहीं थी आज तू आई है तो इसका चेहरा खिला हुआ है और किलकारियां मार रही है। इसको लगता है माँ मिल गयी। छोटी बच्ची ने दूध पिया और रात को वहीँ सोयी रीना के साथ। जब तक रीना पढ़ाई करके बापिस नहीं पहुंचती , नन्ही गुड़िया ना कुछ खाती है ना ही पीती है। रीना ने कक्षा में ये बताते हुए कहा ' सर ,एक छोटे बच्चे के लिए माँ से अधिक ज़रूरी कुछ नहीं होता फिर इसकी माँ इसके साथ नहीं हो कर विदेश क्यों चली गयी ? क्या उसे औरत होते हुए भी इस सच्चाई का पता नहीं था ? मैं कुछ बोलता दूसरी छात्राओं ने एक सुर में कहा 'पैसे और करियर के लिए इंसान सब कुछ दांव पे लगा देता है फिर बच्चे हों या परिवार। लेकिन मैं ठिठक गया क्योंकि छोटे बच्चे को पैसे से कोई मतलब नहीं होता उसे तो माँ चाहिए और पैसे दे कर किराए की माँ ढूंढने वाले पढ़े -लिखे लोग डे-केयर या बेबी सिटर (आया )आदि की सेवाएं तक लेते हैं अपने बच्चे के लिए किराये की माँ उपलब्ध करवाने के लिए । अगर बच्चे की किस्मत अच्छी हो तो 'आया' अच्छी मिल जाती है परन्तु अधिकतर अनुभव बताते हैं की किराये की मायें बेज़ुबान बच्चों पर बहुत ज़ुल्म ढाती हैं। जब अपने बच्चे के लिए आपके पास समय नहीं है तो कोई और आपके बच्चे को ईमानदारी से सेवाएं देगा असंभव है।एक मित्र हैं पति -पत्नी दोनों जॉब करते हैं अपने बच्चे उन्होंने क्रच में डाले हुए हैं और उनके बच्चे क्रच में काम करने वालों को 'माँ' कहते हैं। हमारे मित्र की पत्नी इस बात से खफा तो होती है लेकिन पैसे और करियर के सामने शायद ये सौदा उसे सस्ता लगता है , बच्चे का अधिकार है माँ कुदरत छीन ले तब तो बेबसी है लेकिन मानव निर्मित निर्ममता भभीष्य में ऐसे बच्चो के अपने माता -पिता के साथ रूखे रिश्ते का बीज बो देती है
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