भगवान् ने जन्म और मरण का अधिकार अपने पास रखा है। अपने ढंग से सबके जीवन की शुरुआत तथा अंत करवाता है। ना तो हम जन्म चुन सकते हैं और ना ही मृत्यु ही अपने ढंग से प्राप्त कर सकते हैं। हम सिर्फ बीच के समय {जन्म और मृत्यु }पर अधिकार जता सकते हैं। जो लोग दूसरों के जीवन पर अकारण हस्तक्षेप या आक्रमण करते हैं फिर चाहे उग्रवादियों हों या कट्टरवादी उनको ये याद रखना चाहिए कि भगवान् को उनकी हरकते अच्छी नहीं लगाती। आजकल आत्मघाती आतंकियों का ज़माना है। पूरी दुनिया को इन आतंकियों ने भयभीत किया हुआ है क्योंकि आतंकि लोग सही मायने में मानव जीवन का महत्व नहीं समझते। उनका मस्तिष्क गलत विच्चारों से भर कर इतना भयंकर बना दी जाती है कि वे अपने साथ कईयों को मार कर ही रसंतुष्ट होते हैं। बुरे विचारों का असर कितना भयानक होता है बस ऐसा समझें कि जीवन में दुर्गुणों का प्रवेश होते ही इंसान आत्मघाती हमलावर बनने की तैयारी शुरू कर देता है। इंसान के भीतर ही आत्मघाती हमलावर दुर्गुणों के सहारे से पता नहीं कितनी अदृश्य हत्याएं करता है। काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह तथा अहंकार जब मनुष्य पर अधिकार जमाते हैं तो सहसा ही आत्मघाती कदम उठ जाते हैं। कभी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति उदासीन होकर तो कभी किसी की भावनाओं का और कई बार किसी के या अपने चरित्र का हनन करके। ये अबगुण जिस किसी के ऊपर नियंत्रण कर लेते हैं उससे गलत काम करवा कर सिर्फ पश्चाताप के लिए छोड़ देंगे भी दिखावे के लिए ,फिर जैसे ही मनुष्य ढीला पड़ा वही गलती दुहरवा दी जाती है। ये गलती और पश्चाताप का खेल तब तक जारी रहता है जब तक कोई आकर झकझोरता नहीं 'अरे मूरख क्या करते हो ,खुद ही गलत करते हो खुद ही रोते हो'। जो आतंकी लोगों को मार कर पाप करते हैं वे सत्संग में कभी बैठे ही नहीं होते और जिन लोगों के जीवन में दुर्गुण ताकतवर हो जाते हैं वे भी आत्मघाती हो जाते है अपना नुक्सान कर लेते हैं, जब तक वे सत्संग से दूर रहते हैं क्योंकि सत्संग में ही तो सही और गलत का भेद पता चलता है। बात उन दिनों की है जब पंजाब में आतंक का साया था। एक संत भगत हंसराज जी (गोहाना ,हरयाणा वाले) राम -नाम का संकीर्तन तथा पाठ करने के लिए आये। आतंकवादियों को ये बात बुरी लगी ,उन्होंने अपने 2 साथियों को उन संत को मारने की ज़िम्मेदारी दे दी। सत्संग वाले दिन 2 आतंकवादी पुलिस की वर्दी में सत्संग वाले स्थान पर आ गए। संत श्री सत्संग के बाद सभी साधकों से मिलेंगे इसबात का पता चलते ही, उन दोनों ने संत को गोली मारने का समय वही रखा। सत्संग और प्रवचन होने के बाद भक्तों ने महात्मा के दर्शन करने शुरू किये और उनके हाथों से परशाद लेने लगे। सबसे आखिर में वे दोनों बेहरुपीये संत जी को प्रणाम करते ही कान के पास जा कर धीरे से बोले हम दोनों आतंकी थे आपने दोनों के जीवन को नयी रह दिखाई है। हम अभी से ये घृणित काम छोड़ कर सेवा के सच्चे रस्ते पर चलेंगे। सत्संग में इंसान का अन्तःकरण झकझोरने की ताकत होती है शर्त बस इतनी है की सत्संग में आ जाओ ,बैठ जाओ।
भगवान् ने जन्म और मरण का अधिकार अपने पास रखा है। अपने ढंग से सबके जीवन की शुरुआत तथा अंत करवाता है। ना तो हम जन्म चुन सकते हैं और ना ही मृत्यु ही अपने ढंग से प्राप्त कर सकते हैं। हम सिर्फ बीच के समय {जन्म और मृत्यु }पर अधिकार जता सकते हैं। जो लोग दूसरों के जीवन पर अकारण हस्तक्षेप या आक्रमण करते हैं फिर चाहे उग्रवादियों हों या कट्टरवादी उनको ये याद रखना चाहिए कि भगवान् को उनकी हरकते अच्छी नहीं लगाती। आजकल आत्मघाती आतंकियों का ज़माना है। पूरी दुनिया को इन आतंकियों ने भयभीत किया हुआ है क्योंकि आतंकि लोग सही मायने में मानव जीवन का महत्व नहीं समझते। उनका मस्तिष्क गलत विच्चारों से भर कर इतना भयंकर बना दी जाती है कि वे अपने साथ कईयों को मार कर ही रसंतुष्ट होते हैं। बुरे विचारों का असर कितना भयानक होता है बस ऐसा समझें कि जीवन में दुर्गुणों का प्रवेश होते ही इंसान आत्मघाती हमलावर बनने की तैयारी शुरू कर देता है। इंसान के भीतर ही आत्मघाती हमलावर दुर्गुणों के सहारे से पता नहीं कितनी अदृश्य हत्याएं करता है। काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह तथा अहंकार जब मनुष्य पर अधिकार जमाते हैं तो सहसा ही आत्मघाती कदम उठ जाते हैं। कभी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति उदासीन होकर तो कभी किसी की भावनाओं का और कई बार किसी के या अपने चरित्र का हनन करके। ये अबगुण जिस किसी के ऊपर नियंत्रण कर लेते हैं उससे गलत काम करवा कर सिर्फ पश्चाताप के लिए छोड़ देंगे भी दिखावे के लिए ,फिर जैसे ही मनुष्य ढीला पड़ा वही गलती दुहरवा दी जाती है। ये गलती और पश्चाताप का खेल तब तक जारी रहता है जब तक कोई आकर झकझोरता नहीं 'अरे मूरख क्या करते हो ,खुद ही गलत करते हो खुद ही रोते हो'। जो आतंकी लोगों को मार कर पाप करते हैं वे सत्संग में कभी बैठे ही नहीं होते और जिन लोगों के जीवन में दुर्गुण ताकतवर हो जाते हैं वे भी आत्मघाती हो जाते है अपना नुक्सान कर लेते हैं, जब तक वे सत्संग से दूर रहते हैं क्योंकि सत्संग में ही तो सही और गलत का भेद पता चलता है। बात उन दिनों की है जब पंजाब में आतंक का साया था। एक संत भगत हंसराज जी (गोहाना ,हरयाणा वाले) राम -नाम का संकीर्तन तथा पाठ करने के लिए आये। आतंकवादियों को ये बात बुरी लगी ,उन्होंने अपने 2 साथियों को उन संत को मारने की ज़िम्मेदारी दे दी। सत्संग वाले दिन 2 आतंकवादी पुलिस की वर्दी में सत्संग वाले स्थान पर आ गए। संत श्री सत्संग के बाद सभी साधकों से मिलेंगे इसबात का पता चलते ही, उन दोनों ने संत को गोली मारने का समय वही रखा। सत्संग और प्रवचन होने के बाद भक्तों ने महात्मा के दर्शन करने शुरू किये और उनके हाथों से परशाद लेने लगे। सबसे आखिर में वे दोनों बेहरुपीये संत जी को प्रणाम करते ही कान के पास जा कर धीरे से बोले हम दोनों आतंकी थे आपने दोनों के जीवन को नयी रह दिखाई है। हम अभी से ये घृणित काम छोड़ कर सेवा के सच्चे रस्ते पर चलेंगे। सत्संग में इंसान का अन्तःकरण झकझोरने की ताकत होती है शर्त बस इतनी है की सत्संग में आ जाओ ,बैठ जाओ।
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