संकल्प शक्ति से सिद्धि या इच्छा शक्ति मन के क्रियात्मक उपयोग का तीसरा सबसे प्रमुख तत्व है। इसी के सहयोग से मनुष्य फैसला ले पाता है कि दिखाई दे रहे इतने रास्तों में से किसे अपना कर्म पथ बनाना है , मन को एक लक्ष्य की और अभिकेंद्रित कर पाता है। संकल्प के आधार पर ही मनुष्य अपनी शक्ति तथा स्फूर्ति को कार्य रूप में बदल पाता है। मेहनत इसका स्वरुप तथा क्रिया इसका फल कही गयी है। मन रूपी घोड़े पर सवार के रूप में संकल्प ही बैठा होता है। जब कठिनाइयां रास्ते रोक लेती हैं , हताशा मन मोह लेती है और उत्साह की आग मंद होने लगती है , तब संकल्प ही तो मनुष्य को झूझने के लिए प्रेरित करता है। दृढ संकल्प मनुष्य को उत्साह से भर देता है ओर मन रूपी घोड़े को कर्म पथ पर बढ़ने की प्रेरणा दे कर उद्योग करने के लिए अग्रसर करवाता है। इस संसार के अधिकतर लोग जो परमात्मा से अच्छा मस्तिष्क ले कर आये हैं और संसार में कुछ कर गुजरने की इच्छा भी रखते हैं केवल संकल्प शक्ति के अभाव के कारण मन के लड्डू ही कहते रहते हैं या फिर बातों का हलवा बांटते रहते हैं लेकिन यथार्थ जीवन में कुछ भी कर नहीं पाते। बहुत महीन अंतर है इच्छा और इच्छा शक्ति में। एक है सुख ,यश, कीर्ति और सफलता की अनिश्चित कामना , दूसरी है कामनाओं को यथार्थ यानी हकीक़त में बदलने की निश्चित ,दृढ़ संकल्प शक्ति जो इच्छा को क्रियान्वित करवाती है। इच्छा शक्ति का मुख्य काम होता है सामर्थ्य तथा शक्ति को इकट्ठा करके कार्यरूप में परिणत करना अर्थात मूर्त रूप देना , सपनों को जीवन में उतार ले आना , उनको जिन्दा रूप देना मतलब की सृजन करवाना।
https://youtu.be/QkXcqWdSmUQ
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