भावना ( feeling ) या अन्तः क्षोभ (emotion ) दोनों शब्दों का अर्थ लगभग एक जैसा है हम पर्यायबाची के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।
सभी जीवों में कुछ स्वाभाविक मनोवृत्तियां होती हैं लाभ -हानि , सुख -दुःख ,भय , घृणा , झगड़ालूपन , नकल करना , सीखना , हंसना , संग्रह करना आदि। परिस्थिति के अनुसार कोई भी मनोभाव मनुष्य में उत्तेजना भर सकता है जो उसे कर्म के लिए ज़रूरी स्फूर्ति तथा बल के संचार में सहायक हो जाता है। जंगल में भय उत्पन होने से टाँगे शक्ति शाली हो जाती है परिणामस्वरूप जीव आत्मरक्षा के लिए जी -जान से पूरी ताकत के साथ दौड़ पड़ता है। क्रोध से जो शक्ति संचार होता है , उसका उपयोग दुश्मन पर आक्रमण के रूप में होता है। ऐसे ही कोतुहल , आश्चर्य तथा और जानने की इच्छा ने नए -नए आविष्कार करवा दिए।निर्भर करता है की कब हमारे पर कोन सी भावना अपना अधिकार जमाये बैठी है।
"जा की रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी" अब ये दोहा समझने में कोई कष्टनहीं होगा।
जिस समय हम जिस भी भाव में होंगे संसार हमें वैसा ही प्रतीत होने लगता है , एक पल में ही हम महसूस करते हैं की दुनिया बहुत बुरी है सब मतलबी हैं , कोई किसी का नहीं , सब बुरे हैं और अगले ही पल हम कहने लगे हैं , देखो जी दुनिया में अच्छाई भीकोई चीज़ है , दुनिया ऐसे ही अच्छे लोगों के सहारे खड़ी है आदि ,आदि। अलग -अलग मनोभाव हमारा व्यवहार और नज़रिया तह करते हैं।
जैसा -जैसा भावे , वैसा -वैसा होवे।
जो जैसा भाव करता उसके आसपास वैसा ही संसार बनने लगता है। इस लिए जीवन में "भाव " को कभी भी कमजोर मत होने देना। भावना जीतनी प्रवल होगी परिणाम उतने ही अच्छे मिलेंगे।
मनुष्य में प्रमुखता से तीन भावनाएं या मनोवृत्तियां अधिक ताकतबर होती हैं :-
1. सुख की इच्छा / आराम की चाह
2 . कुछ अच्छा लगना,पसंद करना या घृणा करना
3 . कीर्ति ,सफलता ,यश या जीतने की इच्छा
सुख की चाहना के चलते ही तो अधिकतर कर्म मनुष्य करता है , पैसा , रुतवा ,दिन-रात की मेहनत , निंदा -स्तुति , सेवा -चोरी ,शुभ कर्म -नीच कर्म सभी के पीछे एक ही भाव होता है मैं सुखी हो जाऊं बाकि दुनियां जाए भाड़ में।
आप कोई काम या चीज़ पसंद करते हैं ,अच्छा लगता है या बुरा लगता है सिर्फ इस बात से ही आपके काम करने की क्षमता पर बहुत बड़ा असर पड़ जाता है अधमने मन से किये गए कार्य में सफलता की आशा रखना मूर्खता होगी , जिस काम को करने में आपको उत्साह ही नहीं है ,आपको रूचि ही नहीं है उसका पूर्ण होना अनिश्चित ही होगा। जिस काम को आप हृदय से पसंद करते हैं उसी काम को करने में आपकी सारी शक्ति लगेगी पूर्ण समर्पण से जिसका परिणाम होगा सफलता। विद्यार्थी , खिलाडी ,सैनिक ,नेता जो भी आपको सफल लगते हैं वे अपना काम पसंद करते हैं फलतः अपने काम में सफल है।
विजयकाङ्क्षा या कीर्ति और यश की इच्छा मनुष्य को सभी जीवों से अलग करती है। अपने समाज ,सहयोगियों और साथियों का सम्मान प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य से कड़ा परिश्रम करवाती है। मनुष्य जाती की उन्नति का बहुत अधिक श्रेय इसी वृति या मनोभाव या भावना को जाता है। रातों जाग कर पढ़ने वाले विद्यार्थी हो या कारीगर , डॉक्टर हो या नेता , खिलाड़ी हों या वैज्ञानिक इन सभी के मेहनत करने की प्रेरणा अगर सुख की प्राप्ति है तो दूसरी पुरस्कार ,पहचान की लालसा भी होती है। ये वृति मनुष्य को संसार में ऊँचा उठाने वाली वृति है। https://youtu.be/5JS44o-7H2k
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सभी जीवों में कुछ स्वाभाविक मनोवृत्तियां होती हैं लाभ -हानि , सुख -दुःख ,भय , घृणा , झगड़ालूपन , नकल करना , सीखना , हंसना , संग्रह करना आदि। परिस्थिति के अनुसार कोई भी मनोभाव मनुष्य में उत्तेजना भर सकता है जो उसे कर्म के लिए ज़रूरी स्फूर्ति तथा बल के संचार में सहायक हो जाता है। जंगल में भय उत्पन होने से टाँगे शक्ति शाली हो जाती है परिणामस्वरूप जीव आत्मरक्षा के लिए जी -जान से पूरी ताकत के साथ दौड़ पड़ता है। क्रोध से जो शक्ति संचार होता है , उसका उपयोग दुश्मन पर आक्रमण के रूप में होता है। ऐसे ही कोतुहल , आश्चर्य तथा और जानने की इच्छा ने नए -नए आविष्कार करवा दिए।निर्भर करता है की कब हमारे पर कोन सी भावना अपना अधिकार जमाये बैठी है।
"जा की रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी" अब ये दोहा समझने में कोई कष्टनहीं होगा।
जिस समय हम जिस भी भाव में होंगे संसार हमें वैसा ही प्रतीत होने लगता है , एक पल में ही हम महसूस करते हैं की दुनिया बहुत बुरी है सब मतलबी हैं , कोई किसी का नहीं , सब बुरे हैं और अगले ही पल हम कहने लगे हैं , देखो जी दुनिया में अच्छाई भीकोई चीज़ है , दुनिया ऐसे ही अच्छे लोगों के सहारे खड़ी है आदि ,आदि। अलग -अलग मनोभाव हमारा व्यवहार और नज़रिया तह करते हैं।
जैसा -जैसा भावे , वैसा -वैसा होवे।
जो जैसा भाव करता उसके आसपास वैसा ही संसार बनने लगता है। इस लिए जीवन में "भाव " को कभी भी कमजोर मत होने देना। भावना जीतनी प्रवल होगी परिणाम उतने ही अच्छे मिलेंगे।
मनुष्य में प्रमुखता से तीन भावनाएं या मनोवृत्तियां अधिक ताकतबर होती हैं :-
1. सुख की इच्छा / आराम की चाह
2 . कुछ अच्छा लगना,पसंद करना या घृणा करना
3 . कीर्ति ,सफलता ,यश या जीतने की इच्छा
सुख की चाहना के चलते ही तो अधिकतर कर्म मनुष्य करता है , पैसा , रुतवा ,दिन-रात की मेहनत , निंदा -स्तुति , सेवा -चोरी ,शुभ कर्म -नीच कर्म सभी के पीछे एक ही भाव होता है मैं सुखी हो जाऊं बाकि दुनियां जाए भाड़ में।
आप कोई काम या चीज़ पसंद करते हैं ,अच्छा लगता है या बुरा लगता है सिर्फ इस बात से ही आपके काम करने की क्षमता पर बहुत बड़ा असर पड़ जाता है अधमने मन से किये गए कार्य में सफलता की आशा रखना मूर्खता होगी , जिस काम को करने में आपको उत्साह ही नहीं है ,आपको रूचि ही नहीं है उसका पूर्ण होना अनिश्चित ही होगा। जिस काम को आप हृदय से पसंद करते हैं उसी काम को करने में आपकी सारी शक्ति लगेगी पूर्ण समर्पण से जिसका परिणाम होगा सफलता। विद्यार्थी , खिलाडी ,सैनिक ,नेता जो भी आपको सफल लगते हैं वे अपना काम पसंद करते हैं फलतः अपने काम में सफल है।
विजयकाङ्क्षा या कीर्ति और यश की इच्छा मनुष्य को सभी जीवों से अलग करती है। अपने समाज ,सहयोगियों और साथियों का सम्मान प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य से कड़ा परिश्रम करवाती है। मनुष्य जाती की उन्नति का बहुत अधिक श्रेय इसी वृति या मनोभाव या भावना को जाता है। रातों जाग कर पढ़ने वाले विद्यार्थी हो या कारीगर , डॉक्टर हो या नेता , खिलाड़ी हों या वैज्ञानिक इन सभी के मेहनत करने की प्रेरणा अगर सुख की प्राप्ति है तो दूसरी पुरस्कार ,पहचान की लालसा भी होती है। ये वृति मनुष्य को संसार में ऊँचा उठाने वाली वृति है। https://youtu.be/5JS44o-7H2k
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