भावना ( feeling ) या अन्तः क्षोभ (emotion ) दोनों शब्दों का अर्थ लगभग एक जैसा है हम पर्यायबाची के रूप में प्रयोग कर सकते हैं । सभी जीवों में कुछ स्वाभाविक मनोवृत्तियां होती हैं लाभ -हानि , सुख -दुःख ,भय , घृणा , झगड़ालूपन , नकल करना , सीखना , हंसना , संग्रह करना आदि। परिस्थिति के अनुसार कोई भी मनोभाव मनुष्य में उत्तेजना भर सकता है जो उसे कर्म के लिए ज़रूरी स्फूर्ति तथा बल के संचार में सहायक हो जाता है। जंगल में भय उत्पन होने से टाँगे शक्ति शाली हो जाती है परिणामस्वरूप जीव आत्मरक्षा के लिए जी -जान से पूरी ताकत के साथ दौड़ पड़ता है। क्रोध से जो शक्ति संचार होता है , उसका उपयोग दुश्मन पर आक्रमण के रूप में होता है। ऐसे ही कोतुहल , आश्चर्य तथा और जानने की इच्छा ने नए -नए आविष्कार करवा दिए।निर्भर करता है की कब हमारे पर कोन सी भावना अपना अधिकार जमाये बैठी है। "जा की रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी" अब ये दोहा समझने में कोई कष्ट नहीं होगा। जिस समय हम जिस भी भाव में होंगे संसार हमें वैसा ही प्रतीत होने लगता है , एक पल में ही हम महसूस करते हैं की दुनिया बहुत बुरी है सब मतलब...