बजट ने बिपक्ष के पास सिर्फ एक ही मुद्दा रहने दिया और वो है "अच्छे दिनों के लिए सरकार को और क्या करना चाहिए" ? मोदी सरकार के काम देश और समाज के सुधार के लिए हैं ,भारत बहुत अच्छी स्थिति में पहुँच रहा है। बाजपई सरकार ने भी ऐसी ही कामयाब कोशिश की थी लेकिन भारत के लोगों ने बीजेपी को 10 साल के बनवास पे भेज दिया था क्योंकि भारत के समाज के लिए "देश" बहुत बाद में आता है। अगर कोई बाजपेई या मोदी कोशिश करे भी 'इंडिया को फर्स्ट ' रखने की अटपटा सा तो लगता ही है। इस बजट में किसानो की आमदनी बढ़ाने की बात हुई है जो बहुत सही सोच है , परन्तु कई JNU शिक्षित विद्वान टीवी पे विचार साँझा कर रहे थे के 'किसानो के कर्ज़े मुआफ क्यों नहीं किये जाते , जब व्यपारियों के कर्जे मुआफ होते रहे हैं तो किसानो के क्यों नहीं। बात सही है , मगर अधिकतर कर्जे जिन किसानो ने उठाये हैं वे बादल या हूडा या चौटाला टाइप ही होते हैं। जब भी कोई ऐसी योजना आती है फायदा फ्रॉड लोगों ने ही लिया है। हरयाणा में कांग्रेस सरकार ने बिजली के बिल मुआफ किये और शर्त रखी की सिर्फ उनके बिल मुआफ होंगे जिन्होंने एक भी रुपया बिजली के बिल का नहीं भरा है, अर्थात सिर्फ चोरों को फायदा हुआ साधारण जनता तो चोरी करती ही नहीं है जब तक मजबूरी ना हो, किसानो के लोन मुआफ़ी का फायदा भी गलत लोगों को होगा या राजनीतिक किसानो को होगा। क्योंकि साधारण किसान तो आढ़तियों से अधिक व्याज पर बड़ी आसानी से लोन लेता है क्योंकि बैंको की शर्तें तथा कागज़ीकार्यवाहियां इतनी उलझाने वाली होती हैं के साधारण किसान तो सपने में भी सरकारी ऋण के बारे में नहीं सोचता। मेरा मानना है के किसान की सहयता करने का सही तरिका यही है के किसान को नई तकनीकें प्रदान की जाएँ और उसका माल सही मूल्य पे खरीदा जाये। इस के लिए सरकार को सकारात्मक पहल करके जैसी सुविधाएँ सेब उत्पादकों को उत्पाद बेचने के लिए हिमाचल या कश्मीर में
अब दिक्कत किसान की और बढ़ जाती है , कहाँ जाये अपनी फसल ले कर? पहले ही फसल एक मंडी तक पहुंचाने में किराया खर्चा होता है फिर से किराया खर्च करके किस मंडी में ले जाए जहाँ उससे उचित कीमत मिले। फिर अंत में औने -पौने दामो पर वह अपनी फसल बेच कर बापिस चला जाता है। किसानो की फसल उसी क्षेत्र की मंडी में विके जहाँ वो फसल उगती है तो किसानो की आमदनी में भारी इजाफा हो सकता है। रही बात बिपक्ष की तो उनका काम ही निंदा करना है
अब दिक्कत किसान की और बढ़ जाती है , कहाँ जाये अपनी फसल ले कर? पहले ही फसल एक मंडी तक पहुंचाने में किराया खर्चा होता है फिर से किराया खर्च करके किस मंडी में ले जाए जहाँ उससे उचित कीमत मिले। फिर अंत में औने -पौने दामो पर वह अपनी फसल बेच कर बापिस चला जाता है। किसानो की फसल उसी क्षेत्र की मंडी में विके जहाँ वो फसल उगती है तो किसानो की आमदनी में भारी इजाफा हो सकता है। रही बात बिपक्ष की तो उनका काम ही निंदा करना है
Comments