पिछले दिनों में एक विचार ने मुझे काफी विचलित किया और परिणाम स्वरूप मैंने अपने लेखन में बदलाब करने का निर्णंये लिया। सकारात्मकता को अब मैंने अपने लेखन की सर्वश्रेष्ठ पूँजी बनाने की शुरुआत की है। राजनितिक विचार और कटाक्ष भी होंगे लेकिन मूलतत्व "सकारात्मकता " अब मुख्य ध्ये होगा। क्योंकि अपने लोगों तथा समाज की अगर तारीफ हम नहीं करेंगे ,अच्छे कामो की अगर रौशनी हमारे समाज में फैलानी है तो नकारात्मकता को छोड़ना होगा। ओबैसी क्या कहता है क्या फरक पड़ता है , JNU में कुछ एक मूर्ख लोग देश तोड़ने की बात करें तो उनको महत्व क्यों दें ? बल्कि देश में हो रहे अच्छे काम तथा करने वालों के बारे में बात करेंगे तो कुछ सीखने को मिलता रहेगा। शव्दों का असर बहुत है ,ऐसे ही कर्मो का भी।
हमारे देश में नकारात्मकता जानकर या अनजाने में फैलाई गयी है क्या फरक पड़ता है , मूलतत्व है आज़ादी के बाद से हमारे हीरो और पहचान तथा इतिहास सभी पर परोक्ष रूप से प्रशन चिन्ह लगा दिए गए , पढ़ाई में इतना बदलाब हुआ के लोग भारतीयता का सही रूप ही भूल गए।
एक युवा ने प्रशन किया "भारत हमारी माता कैसे हो सकता है " विदेशों में तो ये सब ढकोसले नहीं हैं। गुस्सा करने की बजाये चिंतन का विषय है जब एक भारतीय युवा ऐसे सोचने लगा है देश के बारे में ,मिटटी के बारे में या धरती के बारे में। बहुत तीखा लेकिन गज़ब का प्रश्न है जो युवा के मन में आया। हम छोटे थे तो हमारी पुस्तक में एक कहानी थी जिसमे एक राजा एक पक्षी की जान बचाने के लिए अपने शरीर के टुकड़े काट कर दे देता है। हमारा इतिहास ऐसे ही महान लोगों का है जीव ह्त्या हमारे समाज में हमेशा से हीन या नीच गिनी जाती थी , ये दया का स्वाभाव भारत के लोगों के DNA में है इसका उदाहरण हमे मिलता है देहरादून में शक्तिमान नामक घोड़े की दुर्घटना में टांग टूट जाने से देश की जनता दर्द से कराह उठी । विडिओ देखे तो हिंसा दया में बदल गयी ऐसा नहीं है। ये दया का स्वाभाव है भारतियों का लेकिन ये गुण झूठे आवरणों के नीचे दवा हुआ है , जब भी आवरण थोड़ा छटकता है स्वभाव प्रकट हो जाता है लेकिन ये होता तभी है जब हमे तारीफ़ मिलने वाली हो , वरना हम ये सोच उभरने भी नहीं देते। एक घोड़े के लिए सभी दुखी हुए लेकिन एक गौ रक्षक की मृत्यु किसी को भी कष्ट पूर्ण नहीं लगी , क्यों ? क्योंकि मीडिया में गौ रक्षक की खबर नहीं दिखाई गयी अगर दिखी भी तो नीच दृष्टि से या हीन भाव से और हमारा दया का भाव नहीं बन पाया। साफ़ है मीडिया आज बड़ा महत्वपूर्ण हो गया है हमारे जीवन में लेकिन क्या मीडिया हमारे बज़ुर्गों और गुणो को निर्धारित करेगा ?
मीडिया से भी अधिक संस्कार हमे हमारे बड़ों से , पुस्तकों से मिलते है शायद यही बजह है के नरेंदर मोदी भी बच्चों को पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं। खैर इस बीच एक और धमाका किया है पतंजलि ने गौ-दूध से बनी हुई चॉकलेट्स मार्किट में उत्तारी गयी हैं , गौ -चर्वी की चॉकलेट्स खाने वालों को गौ-दूध की बानी हुई चॉकलेट्स पसंद आये या ना आये लेकिन तरीफ तो करनी ही चाहिए क्योंकि गौ-दूध से बनी चॉकलेट ,गौ-चर्वी से बनने वाली चॉकलेट से तो अच्छा है और हिंसा भी नहीं हुई है इसे बनाने में। बाबा रामदेव तारीफ़ के काबिल तो हैं , कांग्रेस और बड़ी -बड़ी कंपनियों के सामने नित नए उत्पाद पेश करके उनके खेमों में उत्पाद मचा दिया है। सबसे बड़ी बात है बापू आसाराम की तरह बाबा रामदेव दुश्मनो की चालों से अनभिज्ञ नहीं हैं,वरना बड़ी जल्दी वे भी बापू आसाराम की तरह फंसा दिए जा चुके होते। डॉ. राजीव दिक्षित ने सभी भारत से जुड़े इतिहासिक सच और षड्यंत्रों का भाड़ा फोड़ा है लेकिन मीडिया में उनकी बातों को कोई महत्व न दिए जाने के कारण भारत के अधिकतर भोले - भाले लोग अनजान हैं।
हमारे देश में नकारात्मकता जानकर या अनजाने में फैलाई गयी है क्या फरक पड़ता है , मूलतत्व है आज़ादी के बाद से हमारे हीरो और पहचान तथा इतिहास सभी पर परोक्ष रूप से प्रशन चिन्ह लगा दिए गए , पढ़ाई में इतना बदलाब हुआ के लोग भारतीयता का सही रूप ही भूल गए।
एक युवा ने प्रशन किया "भारत हमारी माता कैसे हो सकता है " विदेशों में तो ये सब ढकोसले नहीं हैं। गुस्सा करने की बजाये चिंतन का विषय है जब एक भारतीय युवा ऐसे सोचने लगा है देश के बारे में ,मिटटी के बारे में या धरती के बारे में। बहुत तीखा लेकिन गज़ब का प्रश्न है जो युवा के मन में आया। हम छोटे थे तो हमारी पुस्तक में एक कहानी थी जिसमे एक राजा एक पक्षी की जान बचाने के लिए अपने शरीर के टुकड़े काट कर दे देता है। हमारा इतिहास ऐसे ही महान लोगों का है जीव ह्त्या हमारे समाज में हमेशा से हीन या नीच गिनी जाती थी , ये दया का स्वाभाव भारत के लोगों के DNA में है इसका उदाहरण हमे मिलता है देहरादून में शक्तिमान नामक घोड़े की दुर्घटना में टांग टूट जाने से देश की जनता दर्द से कराह उठी । विडिओ देखे तो हिंसा दया में बदल गयी ऐसा नहीं है। ये दया का स्वाभाव है भारतियों का लेकिन ये गुण झूठे आवरणों के नीचे दवा हुआ है , जब भी आवरण थोड़ा छटकता है स्वभाव प्रकट हो जाता है लेकिन ये होता तभी है जब हमे तारीफ़ मिलने वाली हो , वरना हम ये सोच उभरने भी नहीं देते। एक घोड़े के लिए सभी दुखी हुए लेकिन एक गौ रक्षक की मृत्यु किसी को भी कष्ट पूर्ण नहीं लगी , क्यों ? क्योंकि मीडिया में गौ रक्षक की खबर नहीं दिखाई गयी अगर दिखी भी तो नीच दृष्टि से या हीन भाव से और हमारा दया का भाव नहीं बन पाया। साफ़ है मीडिया आज बड़ा महत्वपूर्ण हो गया है हमारे जीवन में लेकिन क्या मीडिया हमारे बज़ुर्गों और गुणो को निर्धारित करेगा ?
मीडिया से भी अधिक संस्कार हमे हमारे बड़ों से , पुस्तकों से मिलते है शायद यही बजह है के नरेंदर मोदी भी बच्चों को पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं। खैर इस बीच एक और धमाका किया है पतंजलि ने गौ-दूध से बनी हुई चॉकलेट्स मार्किट में उत्तारी गयी हैं , गौ -चर्वी की चॉकलेट्स खाने वालों को गौ-दूध की बानी हुई चॉकलेट्स पसंद आये या ना आये लेकिन तरीफ तो करनी ही चाहिए क्योंकि गौ-दूध से बनी चॉकलेट ,गौ-चर्वी से बनने वाली चॉकलेट से तो अच्छा है और हिंसा भी नहीं हुई है इसे बनाने में। बाबा रामदेव तारीफ़ के काबिल तो हैं , कांग्रेस और बड़ी -बड़ी कंपनियों के सामने नित नए उत्पाद पेश करके उनके खेमों में उत्पाद मचा दिया है। सबसे बड़ी बात है बापू आसाराम की तरह बाबा रामदेव दुश्मनो की चालों से अनभिज्ञ नहीं हैं,वरना बड़ी जल्दी वे भी बापू आसाराम की तरह फंसा दिए जा चुके होते। डॉ. राजीव दिक्षित ने सभी भारत से जुड़े इतिहासिक सच और षड्यंत्रों का भाड़ा फोड़ा है लेकिन मीडिया में उनकी बातों को कोई महत्व न दिए जाने के कारण भारत के अधिकतर भोले - भाले लोग अनजान हैं।

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