अगर भारत की बर्तमान स्थिति देखि जाये तो एक बात समझ में आती है देश दो अलग-अलग विचारधाराओं में बंट चूका है एक RSS वाली दूसरी ISIS वाली। अब आप स्वयं देखें JNU के विद्वान , कांग्रेस के सिपेसलार , मुस्लिम्स तथा ईसाई नेता अधिकतर लोग पाकिस्तान जिंदाबाद कहने में शर्म महसूस नहीं करते हैं लेकिन भारत माता की जय कहने से अच्छा इनको मरना लगता है।स्थिति खतरनाक इस लिए महसूस होती है क्योंकि देश में नकारात्मकता को मुख्य ख़बरों में जगह मिलती है लेकिन सकारात्मक बदलाब और सकारात्मक ख़बरें कहीं छुपा दी जाती हैं। पिछले दिनों गुजरात के एक व्यवसायी ने 200 करोड़ रूपये बेटिओं के लिए दान कर दिए , जिस घर में दूसरी बेटी जन्म लेगी उस परिवार को 2 लाख से अधिक रूपये मिलेंगे। बिडम्बना देखिये ये दिलेरी या दरियादिली सुर्खी नहीं बन सकी लेकिन देशद्रोही का संसद मार्च प्राइम टाइम की खबर बना दी गयी। दिल्ली में विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समारोह होता है 35 लाख लोग देश और विदेश से आकर हिस्सा लेते हैं , भारत में दुनिया धन्यबादी होकर आयी , बिना ख़ुशी -सुख मिले कौन लाखों रुपए खर्च करके किसी दुसरे देश में दो -तीन दिन के लिए आता है ? लेकिन लोग आये कार्यक्रम भी हुआ परन्तु भारतीय मीडिया में ये खबर सुर्खी नहीं बनी ,सुर्खी बनी तो तीन दिन के कार्यक्रम के बाद बचे हुए कूड़े के ढेर जो आर्ट ऑफ़ लिविंग के कार्यकर्ताओं द्वारा इकठ्ठा करके उठाया जा रहा था। मैंने नहीं देखा किसी भी पत्रकार ने विकसित देशों के लोगों से पुछा हो की भारत क्यों आना हुआ ? आप को किस चीज़ ने बाध्य किया भारत आने के लिए ? अगर नकारात्मकता भी दिखानी थी तो विदेशियों से पूछते " अंध विशवसियों के देश में एक करोड़पति संत के पीछे क्यों आये हो ?".चर्चा करते खूब वहस करते कोई फैसला भी सुनाते लेकिन इतना दम शायद नहीं था सेकुलरों में। खैर जनता को गुमराह करना भारत में बहुत आसान है मीडिया महत्वपूर्ण रोल अदा करता हैअफवाहों को फैलाने में। देश में ये विचार बहुत तेज़ी से फ़ैल रहा है की 'देश रक्षा तथा देश सेवा ' की बात अगर कोई करता है तो वो आरएसएस या बीजेपी का होगा। मतलब आज देश सेवा की बात करना भी सेकुलरिस्म को खतरा हो जाता है। ऐसा माहोल बना दिया मीडिया ने। बड़े -बड़े पत्रकार जनता को गुमराह कर रहे हैं , ये उनकी मज़बूरी भी है भाई रोटी तो उनको भी खानी है। आरएसएस ने वर्दी बदली ये खबर बन जाती हैसेकुलरिज्म खतरे में आ जाता है लेकिन आरएसएस ने कहाँ सेवा कार्य किये ये खबर नहीं बनती
"जिस आरएसएस के कैम्प मे महात्मा गांधी ने दौरा किया हो।
जिस आरएसएस को नेहरू जी ने 26 जनवरी कि परेड मे शामिल होने का न्योता दिया हो।
जिस आरएसएस ने 1948 मे भारत विभाजन के बाद शरणार्थियो के लिये 3000 कैम्प लगाय हो।
जिस आरएसएस ने 1962 की चीन लड़ाई के दौरान सैनिको के लिये इंदिरा
गांधी के आह्वान पर खून का कतरा कतरा दान कर दिया हो।
जिस आरएसएस के लिये सिर्फ एक ही मुद्दा काम करता हो #भारत पहले "ये बाते छुप जाती है
क्योंकि नकारात्मक खबर अगर दिखाते हैं तो स्पोंसरज मिलते हैं विज्ञापन मिलते हैं ,इससे ठीक उल्टा है अगर सकारात्मक खबर हो तो। अच्छा विजय माल्या पर भी कांग्रेस के आरोप दिखाए जा रहे हैं , ये नहीं बताया जा रहा के माल्या को राज्यसभा की कुर्सी और अरबों रूपये कॉंग्रेस्स ने ही क़र्ज़ दिया था। इतने सालों से कोई भी देश से नहीं भागा लेकिन जैसे ही मोदी सरकार ने कार्यभार संभाला सभी चोर एक - एक करके भागने लगे हैं। माल्या का भागना दिखाता है के कानून पूरी ताकत से कार्य कर रहा है। ये पक्ष कोई नहीं बता रहा। बाबा रामदेव को क्या ज़रुरत है व्यपार करने की ? बाबा के कई प्रोडक्ट्स खराब हैं , बाबा चोर है ,बाबा करोड़ पति बन गया ,बाबा गरीबों को लूट रहा है , बाबा अंधविश्वास फैला रहा है ,बाबा को राजनीती से क्या मतलब ? बाबा ढोंग और कर्मकांड को बढ़ावा दे रहा है ,आदि आदि। लिस्ट बहुत लम्बी है बाबा पे आरोपों की लेकिन कोई नहीं बता रहा के 'दन्तकान्ति ' का सारा प्रॉफिट शिक्षा पे खर्च किया जा रहा है ,ये चर्चा नहीं होती के बाबा ने पुराने ग्रंथों से देसी नुस्खे निकाल कर सस्ती दवाइयाँ बना कर मानवता को दी है। बापू आसाराम भी ऐसे ही शिकार किये गए हैं। सुखद पहलु ये है की आज़ादी के बाद पहलीबार किसी देसी टूथपेस्ट(दन्तकान्ति ) ने कोलगेट को चुनौती दी है। इस कंपनी का सिर्फ दशमलब पांच प्रतिशत हिस्सा पतंजलि के टूथपेस्ट ने कब्जाया है ,लेकिन दर्द और डर ने नींद उड़ा दी है सभी विदेशियों की और उनके एजेंटों की। मीडिया में पैसे दे कर माहोल बना दिया जाता है ,पिछले दिनों हिमाचल की कांग्रेस सरकार ने पतंजलि के उत्पाद टेस्ट करवाये फिर परिणाम आया के एक बिस्कुट पैक पे जानकारी गलत दी गयी है। अब एक कांग्रेसी ने आरोप लगाया बाबा के घी में मिलावट है , पातंजलि का नाम साफ़ साफ़ लिखा गया ,उसी दौरान एक और कंपनी पे चर्बी प्रयोग करने के आरोप लगाये गए लेकिन उस उद्योग का नाम मीडिया ने नहीं बताया। हहह सेक्युलर और कम्युनल ख़बरों का फरक तो मीडिया ने जनता को करना सीखा दिया। आज ही पूनम आई कोशिश का लेख पढ़ा दुःख हुआ आज उनकी ज़मात का भी पता चला वरना हम तो आजतक उनको अच्छे लेखको लिस्ट में डालते रहे

Comments